बिहार विधानसभा चुनाव के लिए हुई मतगणना के बाद प्रदेश की राजनीतिक तसवीर स्पष्ट दिखाई देने लगी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की स्पष्ट बहुमत की सरकार बन रही है। इसके निहितार्थ एकदम स्पष्ट हैं कि बिहार के मतदाताओं ने भाजपा के साथ नीतीश को फिर से प्रचंड बहुमत के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बनाने पर अपनी मुहर लगा दी है। दूसरी ओर कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व में बनाए गए महागठबंधन को बहुत बड़ा झटका लगा है। यह झटका कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है, क्योंकि कांग्रेस इसकी आदी हो चुकी है, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल के लिए यह बहुत बड़ा आघात इसलिए भी है, क्योंकि राजद के पास बिहार ही था, जहाँ वह अस्तित्व में थी। इसमें सबसे बड़ी बात यह भी है कि कांग्रेस और राजद का गठबंधन अपनी पिछली स्थिति को बरकरार रखने में भी असफल रहा है। पिछले चुनाव में राजद बहुमत की संख्या से कुछ ही दूर रहा, लेकिन इस बार यह संख्या बहुत कम होती दिखाई दे रही है। कांगे्रस का साथ इस बार भी राजद का कुछ भी भला नहीं कर सका, उलटे अपनी राजनीतिक जमीन को संकुचित कर बैठे। कांग्रेस की स्थिति तो इससे भी ज्यादा दयनीय हो चुकी है, वह दहाई की संख्या में आने के लिए भी तरस रही है। इनका वोट चोरी का आरोप भी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका। आरोप लगाने मात्र से कोई अपराधी नहीं बन जाता, उसके लिए समय पर प्रमाण भी देना होता है। कांग्रेस द्वारा वोट चोरी का आरोप लगाते हुए यह दावा किया गया कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव में ब्राजील की एक मॉडल ने 22 बार वोट डाला। इसके विपरीत मॉडल लारिसा नेरी का कहना था कि वे भारत कभी गई ही नहीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब वे भारत आई ही नहीं, तब कांग्रेस का यह आरोप केवल एक नैरेटिव स्थापित करने जैसा ही माना गया। राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इस प्रकार का असत्य आरोप लगाना निश्चित ही लोकतंत्र के लिए घातक ही है।
कांगे्रस ने अपनी स्थिति स्वयं ही कमजोर की है। क्षेत्रीय दलों के सामने समर्पण करने के बाद भी कांग्रेस अपने को बहुत बड़ा दल मानती है और वैसा ही व्यवहार भी करती है। जबकि राजद ने कांग्रेस को ज्यादा भाव नहीं दिया। राष्ट्रीय जनता दल की हार के पीछे एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि बिहार में फिर से यादव राज की संभावना से मतदाता नाराज हुआ, इसके जानने के बाद भी तेजस्वी ने सहयोगी दलों की आवाज को अनसुना करते हुए विधानसभा के चुनाव में राजद की ओर से 52 प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया। इससे अन्य मतदाता इनकी ओर उतना नहीं आ सका, जितनी उम्मीद की जा रही थी। इसको भाजपा के राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया, जो भाजपा के लिए लाभदायक साबित हुआ।
बिहार के मतदाताओं ने प्रदेश की जो राजनीतिक तस्वीर बनाई है, वह चुनाव बाद किए गए सर्वेक्षण को सही साबित कर रहे हैं। इस सर्वेक्षण को राजद के नेता तेजस्वी पूरी तरह से नकार चुके थे, लेकिन अब परिणाम के बाद तेजस्वी को यही लग रहा होगा कि सर्वेक्षण सही थे। इसके बाद राजद की अब सबसे बड़ी दुविधा यह भी है कि उनके परिवार में चल रही विरासत की लड़ाई में राजद की कमान कौन संभालेगा। क्योंकि तेजस्वी और तेजप्रताप में एक दूसरे को कमजोर करने की राजनीति का खेल चल रहा है। तेजप्रताप भले ही राजनीतिक उत्थान नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने तेजस्वी के बढ़ते कदमों पर बहुत बड़ा ब्रेक लगा दिया है। इसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि तेजप्रताप को खड़ा करने के लिए अंदर की राजनीति ही काम कर रही है। राजद में जो नेता तेजस्वी को नापसंद करते थे वे स्वाभाविक रूप से तेजप्रताप के पाले में खड़े हो गए। इसमें खास तथ्य यह भी है कि कई लोग खुलकर साथ थे तो कई राजनेता अंदर ही अंदर तेजस्वी की जड़ को काट रहे थे।
राष्ट्रीय जनता दल की सबसे बड़ी कमजोरी यह भी मानी जा सकती है कि लोकतांत्रिक चुनाव में क्या केवल लालू प्रसाद यादव का परिवार ही राजद का उत्तराधिकारी हो सकता है। क्योंकि लालू यादव के दोनों ही पुत्र अपने आपको खानदानी विरासत का उत्तराधिकारी मानने का दावा कर रहे हैं। हम यह जानते ही होंगे कि दो की लड़ाई में हमेशा तीसरे का ही फायदा होता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि राजद नेताओं की आपसी लड़ाई का लाभ भी दूसरे राजनीतिक दलों को ही हुआ होगा।
विपक्ष के सामने सबसे कठिन स्थिति यही थी कि जब प्रदेश में उनकी सरकार रही, तब के बिहार और वर्तमान बिहार की स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है। मतदाताओं ने इन दोनों स्थितियों का भी अध्ययन किया ही होगा। अब बिहार जंगलराज के टैग से बाहर निकल चुका है, इसलिए बिहार का मतदाता बिहार के लिए फिर से जंगलराज का टैग लगाने की मानसिकता में नहीं था। विपक्ष के पास इतना बोलने का सामर्थ्य भी नहीं था कि यह अपने शासन की उपलब्धियों को बताने का साहस कर पाता। दूसरा कांग्रेस सहित विपक्ष के दलों की ओर से वोट चोरी का मामला उठाकर हवा को अपनी ओर मोड़ने का प्रयास किया, लेकिन उसके प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। जो प्रमाण दिए गए, वह फुस्स हो गए।
मतगणना के बाद स्वाभाविक रूप से बिहार की राजनीति में फिर से भूचाल आना तय है। आपस में ही आरोप लगाने की राजनीति शुरू होगी। हार का ठीकरा फोड़ने की कवायद भी होगी। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि इसका ठीकरा हर बार की तरह ईवीएम पर फोड़ा जाए। इसके अलावा विपक्ष के पास वोट चोरी का मुद्दा तो पहले से ही तैयार है। विपक्ष के राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि जब घर में पराजित करने वाले पैदा हो जाएं, तब दूसरों को दोष देना उचित नहीं। अपनी स्वयं की स्थिति का आकलन करना ही चाहिए। कांग्रेस और राजद के पास अब आत्ममंथन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता।