Friday, November 14, 2025

बिहार : राजग को प्रचंड बहुमत, महागठबंधन को बड़ा झटका


बिहार विधानसभा चुनाव के लिए हुई मतगणना के बाद प्रदेश की राजनीतिक तसवीर स्पष्ट दिखाई देने लगी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की स्पष्ट बहुमत की सरकार बन रही है। इसके निहितार्थ एकदम स्पष्ट हैं कि बिहार के मतदाताओं ने भाजपा के साथ नीतीश को फिर से प्रचंड बहुमत के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बनाने पर अपनी मुहर लगा दी है। दूसरी ओर कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व में बनाए गए महागठबंधन को बहुत बड़ा झटका लगा है। यह झटका कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है, क्योंकि कांग्रेस इसकी आदी हो चुकी है, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल के लिए यह बहुत बड़ा आघात इसलिए भी है, क्योंकि राजद के पास बिहार ही था, जहाँ वह अस्तित्व में थी। इसमें सबसे बड़ी बात यह भी है कि कांग्रेस और राजद का गठबंधन अपनी पिछली स्थिति को बरकरार रखने में भी असफल रहा है। पिछले चुनाव में राजद बहुमत की संख्या से कुछ ही दूर रहा, लेकिन इस बार यह संख्या बहुत कम होती दिखाई दे रही है। कांगे्रस का साथ इस बार भी राजद का कुछ भी भला नहीं कर सका, उलटे अपनी राजनीतिक जमीन को संकुचित कर बैठे। कांग्रेस की स्थिति तो इससे भी ज्यादा दयनीय हो चुकी है, वह दहाई की संख्या में आने के लिए भी तरस रही है। इनका वोट चोरी का आरोप भी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका। आरोप लगाने मात्र से कोई अपराधी नहीं बन जाता, उसके लिए समय पर प्रमाण भी देना होता है। कांग्रेस द्वारा वोट चोरी का आरोप लगाते हुए यह दावा किया गया कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव में ब्राजील की एक मॉडल ने 22 बार वोट डाला। इसके विपरीत मॉडल लारिसा नेरी का कहना था कि वे भारत कभी गई ही नहीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब वे भारत आई ही नहीं, तब कांग्रेस का यह आरोप केवल एक नैरेटिव स्थापित करने जैसा ही माना गया। राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इस प्रकार का असत्य आरोप लगाना निश्चित ही लोकतंत्र के लिए घातक ही है।
कांगे्रस ने अपनी स्थिति स्वयं ही कमजोर की है। क्षेत्रीय दलों के सामने समर्पण करने के बाद भी कांग्रेस अपने को बहुत बड़ा दल मानती है और वैसा ही व्यवहार भी करती है। जबकि राजद ने कांग्रेस को ज्यादा भाव नहीं दिया। राष्ट्रीय जनता दल की हार के पीछे एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि बिहार में फिर से यादव राज की संभावना से मतदाता नाराज हुआ, इसके जानने के बाद भी तेजस्वी ने सहयोगी दलों की आवाज को अनसुना करते हुए विधानसभा के चुनाव में राजद की ओर से 52 प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया। इससे अन्य मतदाता इनकी ओर उतना नहीं आ सका, जितनी उम्मीद की जा रही थी। इसको भाजपा के राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया, जो भाजपा के लिए लाभदायक साबित हुआ।
बिहार के मतदाताओं ने प्रदेश की जो राजनीतिक तस्वीर बनाई है, वह चुनाव बाद किए गए सर्वेक्षण को सही साबित कर रहे हैं। इस सर्वेक्षण को राजद के नेता तेजस्वी पूरी तरह से नकार चुके थे, लेकिन अब परिणाम के बाद तेजस्वी को यही लग रहा होगा कि सर्वेक्षण सही थे। इसके बाद राजद की अब सबसे बड़ी दुविधा यह भी है कि उनके परिवार में चल रही विरासत की लड़ाई में राजद की कमान कौन संभालेगा। क्योंकि तेजस्वी और तेजप्रताप में एक दूसरे को कमजोर करने की राजनीति का खेल चल रहा है। तेजप्रताप भले ही राजनीतिक उत्थान नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने तेजस्वी के बढ़ते कदमों पर बहुत बड़ा ब्रेक लगा दिया है। इसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि तेजप्रताप को खड़ा करने के लिए अंदर की राजनीति ही काम कर रही है। राजद में जो नेता तेजस्वी को नापसंद करते थे वे स्वाभाविक रूप से तेजप्रताप के पाले में खड़े हो गए। इसमें खास तथ्य यह भी है कि कई लोग खुलकर साथ थे तो कई राजनेता अंदर ही अंदर तेजस्वी की जड़ को काट रहे थे।

राष्ट्रीय जनता दल की सबसे बड़ी कमजोरी यह भी मानी जा सकती है कि लोकतांत्रिक चुनाव में क्या केवल लालू प्रसाद यादव का परिवार ही राजद का उत्तराधिकारी हो सकता है। क्योंकि लालू यादव के दोनों ही पुत्र अपने आपको खानदानी विरासत का उत्तराधिकारी मानने का दावा कर रहे हैं। हम यह जानते ही होंगे कि दो की लड़ाई में हमेशा तीसरे का ही फायदा होता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि राजद नेताओं की आपसी लड़ाई का लाभ भी दूसरे राजनीतिक दलों को ही हुआ होगा।

विपक्ष के सामने सबसे कठिन स्थिति यही थी कि जब प्रदेश में उनकी सरकार रही, तब के बिहार और वर्तमान बिहार की स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है। मतदाताओं ने इन दोनों स्थितियों का भी अध्ययन किया ही होगा। अब बिहार जंगलराज के टैग से बाहर निकल चुका है, इसलिए बिहार का मतदाता बिहार के लिए फिर से जंगलराज का टैग लगाने की मानसिकता में नहीं था। विपक्ष के पास इतना बोलने का सामर्थ्य भी नहीं था कि यह अपने शासन की उपलब्धियों को बताने का साहस कर पाता। दूसरा कांग्रेस सहित विपक्ष के दलों की ओर से वोट चोरी का मामला उठाकर हवा को अपनी ओर मोड़ने का प्रयास किया, लेकिन उसके प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। जो प्रमाण दिए गए, वह फुस्स हो गए।

मतगणना के बाद स्वाभाविक रूप से बिहार की राजनीति में फिर से भूचाल आना तय है। आपस में ही आरोप लगाने की राजनीति शुरू होगी। हार का ठीकरा फोड़ने की कवायद भी होगी। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि इसका ठीकरा हर बार की तरह ईवीएम पर फोड़ा जाए। इसके अलावा विपक्ष के पास वोट चोरी का मुद्दा तो पहले से ही तैयार है। विपक्ष के राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि जब घर में पराजित करने वाले पैदा हो जाएं, तब दूसरों को दोष देना उचित नहीं। अपनी स्वयं की स्थिति का आकलन करना ही चाहिए। कांग्रेस और राजद के पास अब आत्ममंथन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता।

Wednesday, November 27, 2024

*महाराष्ट्र और झारखण्ड में जनादेश के मायने*


सुरेश हिंदुस्तानी
देश के दो राज्यों के साथ कुछ राज्यों के उपचुनाव के परिणाम ने सत्ता पक्ष के प्रति अपना जनादेश दिया है। हर चुनाव में सत्ता के प्रति जनता में किसी न किसी बात पर आक्रोश रहता है, लेकिन महाराष्ट्र और झारखण्ड के चुनाव में ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया। जनता ने फिर से उन्हीं सरकारों को फिर से सत्ता संभालने की जिम्मेदारी दी है, जो सत्ता में थी। खास बात यह है कि महाराष्ट्र और झारखण्ड में सत्ता धारी गठबंधन को पहले से ज्यादा सीटें मिली हैं। यह जनादेश न तो किसी के उछलने का मार्ग तैयार करता है और न ही किसी को नकारने की स्थिति पैदा करता है। जहां तक खुशियाँ मनाने की बात है तो महाराष्ट्र में भाजपा नीत गठबंधन जीत की खुशी मना रहा है तो झारखण्ड में इंडी गठबंधन के गले में विजयी माला पहनाई गई है। वहीं उपचुनाव में सबको ख़ुशी और सबक दोनों ही दिए हैं।
महाराष्ट्र और झारखंड में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद अपने हिसाब से राजनीतिक विश्लेषण किए जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए इन चुनावों में प्रादेशिक रूप से जय और पराजय दोनों ही सन्देश प्रवाहित हो रहे हैं। किसी के लिए ख़ुशी तो किसी के लिए गम की स्थिति पैदा करने वाले परिणाम ने यह तो साबित कर दिया है कि देश में किसी एक राजनीतिक दल का न तो व्यापक प्रभाव है और न ही कम सीट प्राप्त करने वाले को कमतर आँका जा सकता है। इस चुनाव की सबसे ख़ास बात यह मानी जा सकती है कि कोई भी पार्टी अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा प्राप्त नहीं कर सकी, जिससे यह सन्देश निकल रहा है कि अब भविष्य की राजनीति की दिशा और दशा गठबंधन के सहारे ही तय होगी। वर्तमान में राजनीति दो विचार धाराओं के बीच है, जिसमें एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के साथ समन्वय बनाकर चलने वाले राजनीतिक दलों का विचार है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के विचारों से तालमेल रखने वाले दलों की बानगी है। इतना ही नहीं इन चुनावों एक दूसरे के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया गया, वह राजनीतिक हिसाब से भले ही जायज ठहराया जा सकता है, लेकिन आम नागरिकों के समक्ष भ्रम जैसी स्थिति को ही प्रादुर्भित करती हैं।
महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों  के परिणाम भाजपा के लिए निश्चित ही अच्छे कहे जा सकते हैं, लेकिन झारखण्ड में सरकार बनाने का सपना लेकर मैदान में उतरी भाजपा को फिर से तैयारी करनी होगी। झारखण्ड के परिणाम को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रति उपजी सहानुभूति को आधार बताया जा रहा है। पिछले दिनों झारखण्ड में हुए भ्रष्टाचार के आरोप में हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद से अलग होना पड़ा था। जिसके बाद हेमंत सोरेन ने चुनाव में इसी को अपना राजनीतिक हथियार बनाया था और चुनाव में अपने पक्ष में वातावरण बनाया। ऐसा लगता है कि झारखंड में भाजपा अपनी ताकत और कमजोरी को भाँपने में विफल हो गई। झारखण्ड में भाजपा इतनी अप्रभावी नहीं कही जा सकती, जैसा उसका इस चुनाव में प्रदर्शन रहा है। पिछले विधानसभा के चुनाव में भाजपा के प्रादेशिक नेताओं की तनातनी जगजाहिर थी, जिसका परिणाम भाजपा के लिए ठीक नहीं था। हालाँकि इस चुनाव में भाजपा ने पिछली गलती को सुधारने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह सत्ता के सीढ़ी का निर्माण कर पाने में असफल रही। अब झारखण्ड में फिर से झारखण्ड मुक्ति मोर्चा की सरकार बनेगी और मुख्यमंत्री के रूप में हेमंत सोरेन फिर मुख्यमंत्री होंगे, यह भी तय लगता है।
परिणाम के बाद अब महाराष्ट्र के चुनावों के बारे में जो राजनीतिक निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं, उसके अनुसार यही कहा जा रहा है कि झारखंड और महाराष्ट्र में राजनीतिक हवा अलग अलग दिशा में बह रही थी। जिसने हवा का रुख भांप लिया, वह हवा के साथ ही चला और सत्ता प्राप्त करने में सफलता हासिल की। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के साथ रहने वाले शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को जनता ने नकार कर शायद यही सन्देश दिया है कि यह सत्ता के लिए किया गया बेमेल गठबंधन ही था। महाराष्ट्र में ऐसे जनादेश का क्या अर्थ होना चाहिए कि एक गठबंधन जीत गया तो दूसरा गठबंधन हार गया। इसी प्रकार झारखण्ड में भी जनादेश की भी समीक्षा की जाने लगी है।
पिछले पांच साल में महाराष्ट्र में जिस प्रकार की राजनीतिक उठापटक हुई थी, उसके केंद्र में कौन था, यह ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता, लेकिन इंडी गठबंधन की मानें तो उसने इसका सारा ठीकरा भाजपा के मत्थे मढ़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। इस राजनीतिक धमा चौकड़ी में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिव सेना ने अपने विभाजन के रूप में चुकाई। जो धड़े अलग हुए वे भाजपा के साथ जाकर खड़े हो गए और महाराष्ट्र में सरकार बनाई। कहा जा रहा है कि जनादेश ने भाजपा के साथ वाली शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को असली होने का प्रणाम पत्र दे दिया है। अब महाराष्ट्र में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन की ही सरकार बनेगी, यह तय है, लेकिन मुख्यमंत्री कौन होगा, इसके कयास भी लगने लगे हैं, क्योंकि महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर भाजपा ने शानदार वापसी की है। ज्यादा उम्मीद इसी बात की है कि एकनाथ शिंदे ही फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे। इसके पीछे राजनीतिक कारण यह भी माना जा रहा है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सहयोगी दलों की जरुरत है, इसलिए भाजपा अपने सहयोगी दलों को अब नाराज नहीं कर सकती। दूसरी बात यह भी है भाजपा ने एकनाथ शिंदे को जिस प्रकार से चौकाने वाले अंदाज में मुख्यमंत्री बनाया था, वह हर किसी के लिए आश्चर्य ही था। अब यह भी हो सकता है कि भाजपा ने जिस प्रकार से पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को उप मुख्यमंत्री बनाया, वही प्रयोग शिंदे के साथ भी किया जा सकता है।

Friday, February 23, 2024

फिर राजनीतिक भंवर में पाकिस्तान

सुरेश हिंदुस्तानी
पाकिस्तान के बनने के पश्चात प्रारंभ से पैदा हुई उसकी राजनीतिक दुश्वारियां अभी तक पीछा नहीं छोड़ रही हैं। सत्ता के संघर्ष के इस खेल में पाकिस्तान ने पाया कुछ नहीं, इसके विपरीत खोया बहुत है। अभी हाल ही में हुए चुनाव में पाकिस्तान के राजनीतिक आसमान में फिर से अस्थिरता के बादल उमड़ते घुमड़ते दिखाई दिए। पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के संकेत पर जबरदस्ती पदच्युत किए गए पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए इस चुनाव में राह को कठिन बनाने की भरपूर राजनीति की गई। इसके बाद भी पाकिस्तान में एक बड़ी ताकत के रूप में अपना स्थान कायम रखा। इसे इमरान खान की लोकप्रियता ही कहा जाएगा कि उनके विरोधी दल ताल ठोककर मैदान में सामने खड़े थे, इसके बाद भी इमरान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आई। वहीं नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग नवाज दूसरे और बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी तीसरे स्थान को ही प्राप्त कर सके। इसके यह भी निहितार्थ हैं कि इन दोनों से इमरान खान ज्यादा लोकप्रिय हैं। जैसा कि पाकिस्तान का चरित्र रहा है कि वहां प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने वाला व्यक्ति तब तक कुछ नहीं कर सकता, जब तक सेना और आतंकी आकाओं का आदेश नहीं मिल जाए। इसे इस रूप में कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पाकिस्तान की सत्ता का निर्धारण सेना के हाथ में ही रहता है। पाकिस्तान में कहने को ही लोकतंत्र है, सच मायनों में वहां सेना का तंत्र ही कार्य करता है। सेना के अधिकारी जब चाहें जैसा चाहें, निर्णय कर सकते हैं। वहां सेना के मुख्य अधिकारी सत्ता को गिराने का काम करते आए हैं। उल्लेखनीय है कि परवेज मुशर्रफ सेना के अधिकारी ही थे, जिन्होंने पाकिस्तान में तख्तापलट करते हुए शासन की बागडोर संभाली थी। इसी प्रकार अन्य भी कई उदाहरण हैं।
यह पाकिस्तान की नियति बन चुकी है कि वहां अभी तक कोई भी राजनीतिक दल सत्ता का संचालन पूरे कार्यकाल तक नहीं कर सका है। क्योंकि वहां सरकार के कामों में सेना का हस्तक्षेप बहुत ज्यादा है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि पाकिस्तान में सेना ने ज्यादातर शासन किया है। एक प्रकार से पाकिस्तान बनने के बाद से ही सेना की राजनीतिक सक्रियता रही है। जिसके कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र होते हुए भी सैनिक शासन जैसा ही रहा है। इस बार के चुनाव में लोकतंत्र के हिसाब से इमरान खान काफी मजबूत दिखाई दे रहे थे, जो चुनाव के परिणामों ने भी स्पष्ट किया, लेकिन इमरान खान की पार्टी बहुमत के आंकड़े से बहुत दूर रही। इमरान खान की पार्टी के नेताओं ने दावा किया था कि उनकी पार्टी 150 से ज्यादा सीटों पर विजय प्राप्त कर रही है। यह आंकड़े मतों की गिनती होते समय प्रारंभिक रूप से दिखने लगे थे, लेकिन उसके बाद स्थिति अचानक से बदल गई। उसके जो उम्मीदवार आगे चल रहे थे, वे पीछे होते चले गए। इस चुनाव में एक बार फिर राजनीतिक विद्वेष की खाई और ज्यादा चौड़ी होती दिखाई दी। नवाज शरीफ के पार्टी ने अपने रास्ते साफ करने के लिए इमरान को जेल भेजने का कुचक्र रचा। इमरान को चार मामलों में सजा भी मिली है, जिसके कारण चुनाव के दौरान इमरान जेल में ही रहे। इसे चुनाव प्रचार से दूर करने की कवायद के रूप में देखा जा गया। इतना ही नहीं इमरान की पार्टी के नेताओं के सामने भी कई प्रकार के संकट खड़े किए गए। फिर भी इमरान को नहीं रोक सके। अब इमरान को रोकने के लिए एक बार फिर से पाकिस्तान गठबंधन सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ा चुका है। यानी फिर से पाकिस्तान में ऐसा राजनीतिक भंवर बन रहा है, जिसमें पाकिस्तान निकलने की कवायद कर रहा था।
पाकिस्तान में कहा यह भी जा रहा कि सेना के हस्तक्षेप के चलते इमरान को सत्ता के मुहाने पर आकर रोक दिया है। चुनाव परिणाम के बाद पाकिस्तान में इमरान के समर्थक सड़कों पर उतर आए और जमकर विरोध किया। इमरान समर्थकों की यह कवायद थम जाएगी, ऐसा फिलहाल तो नहीं लगता। इसलिए कहा यह भी जा रहा है कि पाकिस्तान में आगामी हालात राजनीतिक रूप से रस्सा कसी वाले ही रहेंगे। जिससे फिर जराजनीतिक अस्थिरता होगी और पाकिस्तान के बिगड़े हुए हालात और भी ज्यादा खराब होते जाएंगे, यह तय है।
आज पाकिस्तान की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। पाकिस्तान में भुखमरी के हालात हैं। इसका एक बड़ा कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र का गिरवी होना ही है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान में राजनेता मौज कर रही है और जनता दर दर की ठोकर खाने के लिए मजबूर है। शासन की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने देश की स्थिति को संभाले, परंतु पाकिस्तान में सरकार को संभालने की राजनीति ही की जाती रही है। जिसके कारण पाकिस्तान के ऐसे हालात बने। इतना ही वहां के राजनेता आतंकी आकाओं और सेना की कठपुतली ही बने रहे, जिसके चलते उनको सत्ता का सुख भी प्राप्त हुआ। पाकिस्तान की मौजूदा परिस्थितियां वहां के राजनीतिक नेताओं की देन हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान आज बर्बादी के कगार पर जा चुका है। हम जानते हैं कि इमरान के शासनकाल के दौरान जनता अपना पेट भरने के लिए सड़कों पर उतर आई। लूटपाट भी की, लेकिन राजनेताओं ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और पाकिस्तान की दुर्गति होती चली गई।
अब पाकिस्तान के हालात उससे भी बुरे हो सकते हैं, क्योंकि वहां जोड़ तोड़ करके जो सरकार बनेगी, उसके सामने एक मजबूत विपक्ष होगा, जो सरकार की निरंकुश कार्यवाही पर लगाम लगाने में समर्थ होगी। अब अगर पाकिस्तान को अपनी स्थिति सुधारना है तो उसे सत्ता की राजनीति करने की बजाय जनहित की राजनीति पर ध्यान देने पर बल देना होगा। तभी पाकिस्तान का संकट समाप्त हो सकेगा।
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सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

Wednesday, February 21, 2024

डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों का हुआ विमोचन

डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों का हुआ विमोचन
वर्तमान की युवा पीढ़ी अच्छे साहित्य का निर्माण कर रही है : डॉ. विकास दवे
ग्वालियर। भारतीय संस्कृति के उदात्त चिंतन पर आधारित साहित्य सृजन करने वाली ग्वालियर की साहित्यकार एवं शिक्षाविद डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों का विमोचन समारोह एक भव्य समारोह में किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे, मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुरेश सम्राट एवं सारस्वत अतिथि पीजीवी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. विजय कुमार गुप्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रेमचंद सृजन पीठ के पूर्व निदेशक आचार्य जगदीश तोमर ने की। सरस्वती वंदना का वाचन अर्चना बामनगया ने किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. विकास दवे ने अत्यंत सारगर्भित और सामयिक स्थितियों पर अपने विवेकपूर्ण उद्बोधन में कहा कि आजकल विमर्श के नाम पर समाज और परिवार को बांटा जा रहा है। भारतीय साहित्य भी विमर्श में उलझता जा रहा है। दलित विमर्श को समरसता विमर्श में बदलने की जरूरत है। इससे भारतीय आत्मा और चेतना अपने आप प्रगट होने लगेगी। वे राष्ट्रोत्थान न्यास के विवेकानंद सभागार में आयोजित डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों के विमोचन समारोह में अपना संबोधन दे रहे थे।
मप्र साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित डॉ. वन्दना सेन की पुस्तक आलेख संग्रह उदात्त चेतना और काव्य संग्रह एक नया प्रकाश के विमोचन समारोह के मुख्य वक्ता श्री दवे ने कहा कि वर्तमान की युवा पीढी अच्छे साहित्य का निर्माण कर रही है। पार्वतीबाई गोखले विज्ञान महाविद्यालय की प्राध्यापक डॉ. वंदना सेन को भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर पुस्तकें लिखने के लिए उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए निरंतर इस पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। कार्यक्रम का संचालन राजेश वाधवानी एवं आभार प्रदर्शन ज्योति दोहरे ने किया।
इस मौके पर प्रमुख रूप से देश के प्रसिद्ध कवि तेज नारायण शर्मा बेचैन, अनिल अग्निहोत्री, स्वदेश के समूह संपादक अतुल तारे, स्थानीय संपादक दिनेश राव, डॉ. कुमार संजीव, राजकिशोर वाजपेयी, धीरज शर्मा, डॉ. कमल जैन, डॉ. सुनील पाठक, धीरेंद्र भदौरिया, दिनेश चाकणकर, डॉ. सुखदेव माखीजा, डॉ. पदमा शर्मा, डॉ. मंदाकिनी शर्मा, डॉ. निशांत शर्मा, सुनीता पाठक, करुणा सक्सेना, डॉ. ज्योति उपाध्याय, डॉ. शिवकुमार शर्मा, डॉ. आनंद शर्मा, डॉ. ज्योत्सना सिंह, डॉ. विनोद केशवानी, डॉ. मंजुलता आर्य, महिमा तारे, राजीव अग्रवाल, गोपाल लालवानी, उपेंद्र कस्तूरे, जवाहर प्रजापति, शर्मिला सोनी, आशा त्रिपाठी, व्याप्ति उमड़ेकर, जान्हवी नाईक, मनीष मांझी, उदयभान रजक, आशीष पांडे, रमेश छत्रशाली, उपस्थित रहे।
दृष्टि तय करने से मिलती है सफलता : डॉ. सुरेश सम्राट
मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ. सुरेश सम्राट ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में दृष्टि और मानदंड तय करने से सफलता मिलती है। डॉ. वंदना सेन की दोनों पुस्तकों में राष्ट्रीय भाव का संचेतन तो है ही साथ ही वह समाज को सही दिशा का बोध भी कराती हैं। उन्होंने कहा कि ग्वालियर में हिंदी साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकारों को निखारने का काम किया है।
अच्छी पुस्तकें आज भी पढ़ी जाती हैं : जगदीश तोमर
प्रेमचंद सृजन पीठ मध्यप्रदेश के पूर्व निदेशक जगदीश तोमर ने अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए कहा कि यह सही बात है कि आजकल लोगों में पढ़ने की रुचि कम हुई है, लेकिन अच्छी पुस्तकें आज भी पढ़ी जाती हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य पुरातन काल से समृद्ध रहा है और इसे आगे बढ़ाने का काम अब युवा साहित्यकारों का जारी रखना चाहिए। सारस्वत अतिथि पीजीव्ही महाविद्यालय ग्वालियर के प्राचार्य डॉ. विजय कुमार गुप्ता ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि डॉ. वंदना सेन ने भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर दो पुस्तकें लिखकर हमारे महाविद्यालय का नाम रोशन किया है।

Wednesday, February 14, 2024

मस्तिष्क की संरचना से महसूस होता है ज्यादा दर्द

मस्तिष्क की संरचना से महसूस होता है ज्यादा दर्द

मस्तिष्क की संरचना से महसूस होता है ज्यादा दर्दलंदन : आपने कभी सोचा है कि एक ही तरह की चोट लगने के बावजूद अलग-अलग लोगों को दर्द का एहसास अलग तरीके से क्यों होता है ? वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्क की बनावट में अंतर के कारण लोगों को दर्द का एहसास अलग-अलग तरीके से होता है।

शिकागो की ‘नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी’ की प्रोफेसर वानिया अपाकारियन ने नेतृत्व में अध्ययन क
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र रहे दल ने पाया कि चोटों के प्रति लोग किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे यह मस्तिष्क के भावनात्मक स्तर पर निर्भर करता है।

उन्होंने पाया कि जो अपनी चोट से भावनात्मक तरीके से जितना ज्यादा जुड़ा होता है उसे दर्द का एहसास उतना ही ज्यादा होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अपाकारियन का कहना है कि चोट अपने आप में दर्द महसूस करने के लिए काफी नहीं है। दर्द चोट और मस्तिष्क की अवस्था से जुड़ा होता है। (एजेंसी)

चकनाचूर होता विपक्षी एकता का सपना

चकनाचूर होता विपक्षी एकता का सपना

सुरेश हिन्दुस्थानी

लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां होती हैं। लेकिन जब विपक्ष के पास संख्या बल का अभाव होता है तो वह घायल शेर की तरह से दिखाने का प्रयास करता है। इसी दिखावे के प्रयास में कई बार ऐसी चूक हो जाती है कि उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। संसद में विपक्षी दल तेलगुदेशम पार्टी की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष की जिस प्रकार से किरकिरी हुई, उसकी कसक विपक्षी राजनीतिक दलों को लम्बे समय तक रहेगी। लोकसभा में पर्याप्त संख्याबल न होने के बाबजूद अविश्वास प्रस्ताव को लाना किसी भी प्रकार से न्याय संगत नहीं कहा जा सकता। इस प्रस्ताव को भले ही तेलगुदेशम पार्टी की ओर से लाया गया, लेकिन इसके केन्द्र में कांग्रेस पार्टी के नेता ही दिखाई दिए। विरासती पृष्ठ भूमि के उपजे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने आपको देश के सामने एक परिपक्व राजनेता के रुप में प्रस्तुत करने का राजनीतिक खेल खेला। इसे राहुल गांधी का राजनीतिक अभिनय कहा जाए तो भी ठीक ही होगा, क्योंकि इससे पूर्व कई लोग राहुल गांधी को पप्पू जैसे संबोधन दे चुके हैं।
यह बात सही है कि अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में दोपहर में जब राहुल गांधी अपना वक्तव्य दे रहे थे, उस समय पूरे देश के विपक्षी दलों में एक आस बनती दिखाई दी कि राहुल गांधी अब परिपक्व राजनेता की श्रेणी में आ रहे हैं। समाचार चैनलों में चली बहस में भी राहुल गांधी के नए उदय को नए ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा था, लेकिन जैसे ही समय निकलता गया राहुल गांधी की वास्तविकता देश के सामने आने लगी। राहुल गांधी ने अपने आपको एक बार फिर से पप्पू होने का प्रमाण दे दिया। पहली बात तो यह है कि राहुल गांधी जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से गले मिले, वह जबरदस्ती पूर्वक गले मिलना ही था, क्योंकि इसके लिए संसद उचित स्थान नहीं था।
सबसे बड़ी बात यह भी है कि राहुल गांधी सरकार पर आरोप लगाते समय यह भूल जाते हैं कि वर्तमान सरकार जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है। यानी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार है, इसलिए राहुल गांधी को कम से कम लोकतंत्र का सम्मान तो करना ही चाहिए। राहुल गांधी वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इसलिए उन्हें अपने पद की गरिमा का भी ध्यान रखना चाहिए। ऐसे आरोप लगाने से उन्हें बचना चाहिए, जिनका कोई आधार नहीं है। हम जानते हैं कि राहुल गांधी ने राफेल मुद्दे पर जो वक्तव्य दिया था, वह सार्वजनिक करने वाला नहीं था, क्योंकि रक्षा मामले बेहद संवेदनशील होते हैं, उन्हें उजागर करना भी ठीक नहीं होता, लेकिन राहुल गांधी ने ऐसा किया, जो ठीक नहीं था। अगर राहुल गांधी को संसदीय मर्यादाओं का ज्ञान नहीं है तो उन्हें पहले इनका अध्ययन करना चाहिए, नहीं तो वह नादानी में भविष्य में भी ऐसी ही गलती करते जाएंगे और कांग्रेस पार्टी की जो वर्तमान हालत है वह और खराब होती चली जाएगी। कहा जाता है कि आज कांग्रेस के समक्ष जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ है, उसके लिए कांग्रेस के नेता ही जिम्मेदार हैं, और कोई नहीं। चार वर्ष पहले जिस केन्द्र सरकार का अंत हुआ, उसके कार्यकाल से जनता प्रताड़ित थी, घोटाले होना तो जैसे सरकार की नियति ही बन गई थी। संप्रग सरकार के कार्यकाल में हुए घोटाले के कई प्रकरण आज न्यायालय में विचारधीन हैं। कांग्रेस अगर स्वच्छ प्रशासन देने की बात करती है तो इसके प्रति फिलहाल जनता में विश्वास का भाव पैदा नहीं हो सकता। इसके लिए कांग्रेस को अपने आपको बदलना होगा और कांग्रेस का चाल, चरित्र और चेहरा बदल जाएगा, ऐसा अभी लगता नहीं है।
वास्तवविकता यह भी है कि जिस अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से विपक्ष सरकार को घेरने की योजना बना रहा था, उसमें किसी प्रकार का कोई वजन नहीं था, यह विपक्षी भी भलीभांति जानते थे। इतना ही नहीं उनको अपना संख्या बल भी पता था, फिर भी उन्होंने केवल अपनी राजनीति चमकाने के उद्देश्य से इस अविश्वास प्रस्ताव को रखा। बाद में क्या हुआ यह सभी को पता है। जितनी उम्मीद थी, उतना भी समर्थन इस प्रस्ताव को नहीं मिला और औंधे मुंह गिर गया। जबकि कांग्रेस पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जोर देते हुए कहा था कि हमारे पास अविश्वास प्रस्ताव लाने के पर्याप्त कारण हैं और हमारे पास संख्या संख्या बल है। इसे कांग्रेस का सबसे बड़ा झूठ भी कहा जा सकता है। इससे ऐसा ही लगता है कि कांग्रेस नेता झूठ बोलकर देश की जनता को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। राहुल गांधी ने भी राफेल मामले में संसद में झूठ बोला। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को ऐसे झूठ बोलने से बचना चाहिए।
इस अविश्वास प्रस्ताव के निर्णय के बाद राजग सरकार पर तो कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन विपक्ष द्वारा जिस प्रकार से सत्ता की तड़प को उजागर करने वाली राजनीति की जा रही थी, उसको जरुर गहरा आघात पहुंचा है। अब यह तय सा लगने लगा है कि विपक्षी गठबंधन की जो कवायद देश में चल रही थी, उसमें दरार पड़ेगी। क्योंकि इससे कांग्रेस का वास्तविक आधार देश के सामने आ गया। वर्तमान में कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति का आकलन किया जाए तो ऐसा ही लगता है कि कांग्रेस के पास उतनी भी ताकत नहीं है, जितनी चार वर्ष पूर्व थी। इसके पीछे तर्क यही दिया जा सकता है कि चार वर्ष पहले कांग्रेस के प्रति अच्छा रवैया रखने वाले कई सांसद थे, आज उन सांसदों की संख्या में कमी आई है। अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में संप्रग के पूरे सांसदों ने भी साथ नहीं दिया। इसका आशय यह भी है कि भविष्य में कई राजनीतिक दल संप्रग से नाता तोड़ सकते हैं। ऐसे में जिस प्रकार से विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा गठबंधन की कवायद की जा रही है, वह कमजोर ही होगा। कोई भी राजनीतिक दल कांग्रेस के साथ आने को तैयार नहीं होगा। हां, इतना अवश्य हो सकता है कि जिन राजनीतिक दलों को भाजपा का भय होगा या अपने भविष्य के प्रति संदेह होगा, वह जरुर इस मुहिम का हिस्सा बन सकता है, लेकिन यह एक बार फिर से प्रमाणित हो गया है कि देश में विपक्ष अभी मजबूत विकल्प नहीं बन सका है। सरकार मजबूत है, यह संसद ने भी बता दिया है और जनता भी बता रही है।
आज देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति का अध्ययन किया जाए तो यही दिखाई देता है कि कांग्रेस पार्टी को देश के कई क्षेत्रीय दल अपने स्तर का भी नहीं मान रहे हैं। यह सच भी है कि कई राज्यों में क्षेत्रीय दल आज कांग्रेस से ज्यादा प्रभाव रखते हैं। ऐसे में वह कांग्रेस को कितना महत्व देंगे, इसका पता चल ही जाता है। कांग्रेस की मजबूरी यह है कि वह कई राज्यों में अपने स्वयं की ताकत के सहारे चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकती, इसलिए उसे कई राज्यों में सहारे की आवश्यकता महसूस हो रही है। कर्नाटक में भी यही दिखाई दिया, कांग्रेस ने अपने से कम राजनीतिक प्रभाव रखने वाले दल को राज्य की सत्ता सौंप दी। इसी प्रकार के हालात उत्तरप्रदेश में बन रहे हैं, यहां अभी गठबंधन बना ही नहीं, दरार के संकेत मिलने लगे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)
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सुरेश हिन्दुस्थानी
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माँ की ममता का कोई मुकाबला नहीं 

माँ की ममता का कोई मुकाबला नहीं 

बहुत समय पहले मैंने एक फ़िल्म देखी थी। फ़िल्म का नाम था दीवार। इस फ़िल्म की कहानी कितनी ही सही हो लेकिन फ़िल्म की एक लाइन लंबे समय तक याद की जाती है, जिसमें अभिनेता शशि कपूर अपने भाई अमिताभ बच्चन से कहते थे कि मेरे पास माँ है। यह भले ही एक लाइन की बात कही जा सकती है, लेकिन पूरी फ़िल्म में केवल इसी एक संवाद की बात होती है, अभी तक होती आ रही है और आगे भी होगी, ऐसा अकाट्य विश्वास है। वास्तव में भारतीय संस्कृति में माँ शब्द में एक ऐसा अपनापन है। जिसमें ममता की गहराई है, वात्सल्य का ऐसा अमूल्य खजाना है, जो दुनिया में कहीं अन्यत्र नहीं मिल सकता। इसीलिए हमारे महापुरुषों ने माँ को भगवान का दर्जा दिया है, वहीं किसी भी बच्चे के लिए प्रथम गुरु भी केवल माँ ही है। वास्तव में आज के वातावरण में भी माँ की अद्भुत ममता का कोई मुकाबला नहीं है। कहते हैं किसी व्यक्ति के पास दुनिया की सारी दौलत है और माँ नहीं है, तो वह दुनिया का सबसे बड़ा गरीब आदमी है। दुनिया में धन तो परिश्रम करके भी कमाया जा सकता है, लेकिन माँ का प्यार पैसे से कभी नहीं खरीदा जा सकता है।
कहते हैं भगवान हर समय हर जगह उपलब्ध नहीं हो सकता हैं, इसी लिए भगवान ने माँ को बनाया हैं। हालांकि माँ की महानता को प्रदर्शित करते हुए बहुत कुछ लिखा जा चूका है, पढाया जा चुका हैं पर फिर भी माँ की महिमा इतनी अपरंपार है की फिर भी सब कम ही लगता हैं। वास्तव में माँ की महानता के लिए शब्द दे पाना अत्यंत ही दुष्कर कार्य है, मेरी ओर से माँ की ममता को व्यक्त करने का एक लघुतम प्रयास है, एक ऐसा प्रयास जैसे सूरज को दीपक दिखाना।
एक माँ क्या होती है, वह अपने बच्चे की कितनी चिंता करती है, मुझसे अच्छा कोई नहीं जान सकता। मेरे लिए मेरी माँ ने जो किया है, जितना किया है। वास्तव में वह त्याग कोई नहीं कर सकता। मेरे लिए मेरी माँ भगवान से भी बढ़कर है। लिखने को तो बहुत लिख सकता हूँ, इतना लिख सकता हूँ कि मेरा सामर्थ्य भी कम लगने लगेगा, इसलिए मैं तो यही कहूँगा कि माँ के बारे में लिखना किसी भी लेखक के लिए कठिन ही होगा।
कोई भी माँ हो, माँ सबसे बड़ी होती है। बेटा कितना भी बड़ा हो जाए लेकिन माँ के सामने बेटा हमेशा बच्चा ही रहता है। माँ का उपकार बच्चे पर पूरी उम्र तक बना रहता है। जो माँ मरके भी अपने बच्चे के आसपास रहती है। उसकी हर प्रकार से रक्षा करती है। ऐसा दृश्य हम सभी ने माँ फ़िल्म में देखा भी है। यह है तो एक फ़िल्म का हिस्सा, लेकिन यह सत्य है, मैंने महसूस किया है। मुझे आज भी लगता है कि मेरी माँ आज भी मेरे आसपास है, जो मेरी रक्षा करती है।
भारत में हर वर्ष मई के महीने के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता हैं। ऐसे तो हर दिन माँ की पूजा की जानी चाहिए पर माँ का महत्त्व ओर उनके त्याग के प्रतीक में यह दिन खास तौर पर मनाया जाता हैं। भारत में माँ को पूजने के लिए एक दिन नहीं, पूरी जिंदगी लोग लगा देते हैं। कहा जाता है कि माँ की ममता अनमोल है, उसकी कीमत कोई नहीं चुका सकता है। जन्म से पूर्व भी माँ हमको नौ महीने तक संभाल कर रखती है।
एक बालक माँ के गर्भ में रहता है उस समय से ही पोषण के साथ कई तरह की चीजे अपने माँ से सीखता हैं। मैंने अपने जीवन में कई सारी बाते अपनी माँ से सीखी हैं। हमेशा प्रेम करने वाली माँ कभी-कभी कठोर भी होती है तो सिर्फ अपने बच्चो के भलाई के लिए ही। मुझे इस बात की ख़ुशी हैं की मेरी माँ आज भी मेरे साथ हैं ओर उनके स्नेह ओर आशीर्वाद की शक्ति हमेशा मेरे पास हैं। माँ के उपकारो का वर्णन करना तो असंभव है।
हम यह भली भाँती जानते हैं कि माँ बाप ने हमें आज इस लायक बनाया है, माँ नहीं होती तो हम इस धरती पर भी नहीं होते। लेकिन वर्त्तमान में हम माँ बाप की सेवा से विमुख होते जा रहे हैं। देश में वृद्धाश्रम में अनेक बुजुर्ग अपने बच्चों की अकर्मण्यता को दिखा रहे हैं, इसके बाद भी माँ के दिल में बच्चे के लिए जगह होती है।

बिहार : राजग को प्रचंड बहुमत, महागठबंधन को बड़ा झटका

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए हुई मतगणना के बाद प्रदेश की राजनीतिक तसवीर स्पष्ट दिखाई देने लगी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की स्पष्ट बहुमत...