Wednesday, June 17, 2026

दांपत्य जीवन : जब हम की जगह ले ले मैं

दाम्पत्य जीवन में "हम" की जगह "मैं" ले लेता है तो रिश्ते की नैया डगमगाने लगती है और क्लेश होना रोज की बात हो जाती है। लेकिन यदि पति-पत्नी दोनों ही थोडी सी सूझ-बूझ और धैर्य से काम लें तो उनका रिश्ता एक खूबसूरत मोड लेकर दूसरों के लिए आदर्श बन सकता है।
बच्चों की जिम्मेदारी : पहले मम्मियों के घर में रहने के कारण बच्चों को बाहर घुमाने-फिराने की जिम्मेदारी पापा की होती थी। अब पापा-मम्मी साथ घूम रहे हों तो भी बच्चो मां के बजाय पापा की गोद में नजर आते हैं। इतना ही नहीं, बच्चों की नैपी चेंज करने से ले कर बोतल से दूध पिलाने में भी पुरूष खूब रूचि ले रहे हैं। उनका मानना है कि मां बनने की तरह बाप बनना भी चुनौतीपूर्ण और खुशियों भरा होता है। लगभग कई महिलाएं भी मानती हैं कि उनके पतियों को बच्चों को नाश्ता कराना, मुंह धुलवाना, नहाना-धुलाना और उनके साथ समय बिताना भी अच्छा लगता है।
शॉपिंग: इस बार शॉपिंग के लिए अकेले मत निकलें। अपने पति को भी साथ ले कर जाइए। आपको पता नहीं है कि आमतौर पर कंजूस समझे जाने वाले पुरूषों को शॉपिंग बेहद पसंद होती है। आज के पुरूषों का मानना है कि शापिंग के बहाने वे अपने परिवार के साथ समय भी बिता पाते हैं और दोनों ही पसंद से शॉपिंग भी अच्छी हो जाती है। और शॉपिंग का एक्सपिरिएंस हो जाने पर वे अकेले भी आपकी पसंद की शॉपिंग कर सकते हैं। पुरूषों को खुद से ज्यादा परिवारवालों के लिए शॉपिंग करना पसंद है।
पैकिं ग: ऎसा माना जाता रहा है कि महिलाएं टूर पर जाते समय आवश्यकता से अधिक पैकिंग कर लेती हैं। कहीं घूमने बाहर जाने का प्लान बना रही है तो सूटकेस पैक करने का काम हसबैंड को सौपें। लगभग 60 प्रतिशत पुरूष इस बात को सही मानते हैं। वहीं 100 में से 40 महिलाएं भी स्वीकारती हैं कि अक्सर शहर से बाहर जाते समय आवश्यकता से अधिक पैकिंग हो जाती है। इसका कारण यह है कि महिलाओं को दिनचर्या की हर वस्तु आवश्यक प्रतीत होती हैं। इसके विपरीत पुरूष केवल चुनिंदा और उपयोगी सामानों को ही गठरी में बांधने के आदी होते हैं। खुद को ही सर्वश्रेष्ठ न समझें कई बातों को लेकर महिलाएं और पुरूष दोनों अपने आपको बेस्ट समझते हैं। अगर समझदारी से काम न लें, तो आने वाले समय में इस बात को ले कर आपस में तू-तू,मैं-मैं हो सकती है। इस रिश्ते में एक-दूसरे पर विश्वास करना बहुत जरूरी होता है। हमेशा खुद को ही सर्वश्रेष्ठ न समझें, सामने वाले को भी अपनी बात और काबिलियत रखने का मौका दें। होम मिनिस्टर नहीं बनें होम मैनेजर महिलाओं का मानना है कि पुरूष थोडे पैसे में घर नहीं चला सकते। हाउसवाइफ पैसे के प्रबंधन में खुद को बेहतर मानती हैं। इन्हें लगता है कि होम मिनिस्टर का खिताब इन्हें विरासत में मिला है। वहीं पुरूष भी पैसा खर्च करने के उनके तरीके को ज्यादा सही नही ठहराते हैं। मतलब साफ है कि खुद को बेहतर गृह प्रबंधक मानने के चक्कर में आपकी पतिदेव से ठनती रहेगी। आप घर की वो धुरी हैं जिसके चारों ओर पूरे परिवार का भविष्य घूमता है इसलिए खुद को अच्छा होम मैनेजर बनाएं न कि होम मिनिस्टर। ड्राइविंग: केवल पैसों को खर्च करने में ही नही गाडी ड्राइव करने को लेकर भी आपके और उनके बीच खींचतान हो सकती है। मेट्रो शहरों में हुए एक सर्वे में पाया गया कि 100 में से 51 पुरूष अपनी पत्नियों को कार डा्रइव करने नहीं देते। वहीं 100 में से 52 युवतियां खुद को बेहतर ड्राइवर मानती हैं। वे कार न सही स्कूटी को बाएं हाथ का खेल समझती हैं जबकि हसबैंड उन्हें लापरवाह दुपहिया वाहन चालक मानते हैं। इस स्थिति में दोनों के बीच टकराव होना लाजमी है। अपनी पत्नी क ी काबिलियत पर विश्वास करें और उन्हें खुद से कम न समझें।

Saturday, May 30, 2026

पश्चिम बंगाल : मतदान बढ़ने से उलझे समीकरण

पश्चिम बंगाल में भारी मतदान से यह तो तय हो चुका है कि मतदाता चुनाव का महत्व समझ चुका है। लेकिन इससे राजनीतिक दलों को हिसाब लगाने में पसीना बहाना पड़ रहा है। सबके गणित उलझ गए हैं। पहले चरण में 92 प्रतिशत मतदान जहाँ एक ओर राजनीतिक दलों के लिए चिंता की लकीर खींच रहा है, वहीं एक राजनीतिक लाभ देने का भी संकेत करने वाला भी कहा जा रहा है। इस बार के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। भाजपा बहुत पहले से पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए कदम उठा रही थी। पिछले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव में जिस प्रकार से भाजपा ने अपना राजनीतिक प्रभाव जमाया है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा सकता। यही आंकड़े तृणमूल कांग्रेस की सरकार के लिए खतरे की घंटी बजाते हुए दिखाई देने लगे हैं। ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि उनके सामने अपनी राजनीतिक साख बचाने की मज़बूरी है। राजनीतिक आकलन किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि ममता केवल और केवल पश्चिम बंगाल तक ही अपना राजनीतिक प्रभाव रखती हैं, अगर किसी कारण से पश्चिम बंगाल भी उनके हाथ से निकल जाता है, तो तृणमूल कांग्रेस को अपना जनाधार स्थापित करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ेगा। हालांकि ममता बनर्जी की कार्यशैली को देखकर यह कोई नहीं कह सकता कि वह आसानी से पराजय स्वीकार कर लेंगी। सभी जानते हैं कि वह स्वयं मोर्चा संभाल लेती हैं। एसआईआर के मुद्दे पर हम सभी ने देखा ही है कि वे सर्वोच्च न्यायालय में भी खड़ी हो गई। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का इस तरह मजबूती के साथ खड़ा होने का यह पहला मामला है।
जहाँ तक पश्चिम बंगाल में भविष्य की सरकार बनाने की बात है तो भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के अपने अपने दावे हैं। यह बात भी सही है कि यह दोनों ही राजनीतिक दल मुख्य मुकाबले में हैं। भाजपा के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि उसके राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने प्रभावी रूप से जनता के बीच उपस्थिति दर्ज करवाकर माहौल को अपने पक्ष में करने का भरपूर प्रयास किया, वहीं भाजपा के प्रादेशिक नेताओं ने भी जी तोड़ प्रयास किया। तृणमूल कांग्रेस की ओर से हर जगह ममता बनर्जी की जनसभाओं की ही मांग हो रही थी, जिसे ममता ने पूरा करने का भी प्रयास किया। मतदान प्रतिशत बढ़ने से भाजपा आशान्वित है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के चेहरे से मुस्कान गायब दिखाई दे रही है।
अभी पश्चिम बंगाल में प्रथम चरण का मतदान ही संपन्न हुआ है। बम्पर मतदान के बाद आम जनता में उत्साह की एक नई लहर का प्रादुर्भाव भी हुआ है। जिसके बाद यह भी संभव है कि दूसरे चरण में भी इसकी पुनरावृति होगी। अगर ऐसा होता है तो यह कहना भी तर्कसंगत ही होगा कि इस बार का मतदान बिना भय के संपन्न हो रहा है। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव का इतिहास रक्तरंजित है। वामपंथी दलों के शासन से लेकर तृणमूल कांग्रेस की सरकार के समय हुए सभी चुनावों में हिंसा होती आई है, लेकिन इस बार के चुनावों में इस प्रकार दृश्य का दिखाई नहीं देना, चुनाव प्रबंधन की कुशलता ही मानी जाएगी। पश्चिम बंगाल में यह साफ दिखाई देने लगा है कि इस बार आम जनता भय मुक्त होकर मतदान करने निकल रही है। मतदान प्रतिशत का बढ़ना भी इसी भयमुक्त वातावरण का ही परिचायक है।
प्रायः माना जाता है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी एक सशक्त महिला नेता हैं। आज वे निश्चित रूप से भारतीय राजनीति का एक स्थापित चेहरा हैं। महिला होने के नाते उन्हें महिलाओं की सहानुभूति भी मिलती रही है। लेकिन इस चुनाव में केंद्र भी भाजपा सरकार ने नारी शक्ति को केंद्र मानकर जो वंदन अभियान चलाया, वह भाजपा के लिए एक संजीवनी बनती दिखाई दे रही है। दूसरी प्रमुख बात यह भी है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता बांग्लादेशी घुसपैठियों का खुलेआम समर्थन भी करते रहते हैं। कई राजनीतिक विश्लेषक तो यही मानते हैं कि ये बांग्लादेशी घुसपैठिए ममता की सरकार बनाने में मदद करते रहे हैं। यह सच है या झूठ… इसकी विस्तृत जानकारी जांच के बाद ही सामने आएगी। खास बात यह भी है कि इस चुनाव में ऐसे मतदाता मतदान करने से वंचित रहे, जो अपने भारतीय नागरिक होने का प्रमाण नहीं दे सके। कहा जाता है कि इनमें से अधिकतर वोट तृणमूल कांग्रेस के ही थे। स्वाभाविक ही है कि इसका असर भी ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन पर ही होगा। मुसलमान वर्ग का हितैषी होने का दावा करने वाली तृणमूल कांग्रेस के सामने इस चुनाव में मुसलमान नेताओं अससुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर ने एक चुनौती पेश की। इस चुनौती का असर कितना होगा, इसका पता चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अगर इनका जादू चल गया तो ममता के साथ खेला भी हो सकता है। ममता के सामने इस चुनाव में अपने खुद के वोटरों को साधने की बड़ी चुनौती थी। अब दूसरे चरण का मतदान होना है। चार मई को बम्पर मतदान का क्या परिणाम आएगा। पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी, यह तय हो जाएगा। हालांकि इसके मायने निकाले जा रहे हैं। इस मायनों में मतदान प्रतिशत बढ़ने का आशय भाजपा की लोकप्रियता को बताया जा रहा है, वहीं कुछ विश्लेषक ममता के पक्ष में भी बात करते दिखते हैं।
(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और स्वतंत्र पत्रकार हैं)

Friday, November 14, 2025

बिहार : राजग को प्रचंड बहुमत, महागठबंधन को बड़ा झटका


बिहार विधानसभा चुनाव के लिए हुई मतगणना के बाद प्रदेश की राजनीतिक तसवीर स्पष्ट दिखाई देने लगी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की स्पष्ट बहुमत की सरकार बन रही है। इसके निहितार्थ एकदम स्पष्ट हैं कि बिहार के मतदाताओं ने भाजपा के साथ नीतीश को फिर से प्रचंड बहुमत के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बनाने पर अपनी मुहर लगा दी है। दूसरी ओर कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व में बनाए गए महागठबंधन को बहुत बड़ा झटका लगा है। यह झटका कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है, क्योंकि कांग्रेस इसकी आदी हो चुकी है, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल के लिए यह बहुत बड़ा आघात इसलिए भी है, क्योंकि राजद के पास बिहार ही था, जहाँ वह अस्तित्व में थी। इसमें सबसे बड़ी बात यह भी है कि कांग्रेस और राजद का गठबंधन अपनी पिछली स्थिति को बरकरार रखने में भी असफल रहा है। पिछले चुनाव में राजद बहुमत की संख्या से कुछ ही दूर रहा, लेकिन इस बार यह संख्या बहुत कम होती दिखाई दे रही है। कांगे्रस का साथ इस बार भी राजद का कुछ भी भला नहीं कर सका, उलटे अपनी राजनीतिक जमीन को संकुचित कर बैठे। कांग्रेस की स्थिति तो इससे भी ज्यादा दयनीय हो चुकी है, वह दहाई की संख्या में आने के लिए भी तरस रही है। इनका वोट चोरी का आरोप भी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका। आरोप लगाने मात्र से कोई अपराधी नहीं बन जाता, उसके लिए समय पर प्रमाण भी देना होता है। कांग्रेस द्वारा वोट चोरी का आरोप लगाते हुए यह दावा किया गया कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव में ब्राजील की एक मॉडल ने 22 बार वोट डाला। इसके विपरीत मॉडल लारिसा नेरी का कहना था कि वे भारत कभी गई ही नहीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब वे भारत आई ही नहीं, तब कांग्रेस का यह आरोप केवल एक नैरेटिव स्थापित करने जैसा ही माना गया। राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इस प्रकार का असत्य आरोप लगाना निश्चित ही लोकतंत्र के लिए घातक ही है।
कांगे्रस ने अपनी स्थिति स्वयं ही कमजोर की है। क्षेत्रीय दलों के सामने समर्पण करने के बाद भी कांग्रेस अपने को बहुत बड़ा दल मानती है और वैसा ही व्यवहार भी करती है। जबकि राजद ने कांग्रेस को ज्यादा भाव नहीं दिया। राष्ट्रीय जनता दल की हार के पीछे एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि बिहार में फिर से यादव राज की संभावना से मतदाता नाराज हुआ, इसके जानने के बाद भी तेजस्वी ने सहयोगी दलों की आवाज को अनसुना करते हुए विधानसभा के चुनाव में राजद की ओर से 52 प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया। इससे अन्य मतदाता इनकी ओर उतना नहीं आ सका, जितनी उम्मीद की जा रही थी। इसको भाजपा के राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया, जो भाजपा के लिए लाभदायक साबित हुआ।
बिहार के मतदाताओं ने प्रदेश की जो राजनीतिक तस्वीर बनाई है, वह चुनाव बाद किए गए सर्वेक्षण को सही साबित कर रहे हैं। इस सर्वेक्षण को राजद के नेता तेजस्वी पूरी तरह से नकार चुके थे, लेकिन अब परिणाम के बाद तेजस्वी को यही लग रहा होगा कि सर्वेक्षण सही थे। इसके बाद राजद की अब सबसे बड़ी दुविधा यह भी है कि उनके परिवार में चल रही विरासत की लड़ाई में राजद की कमान कौन संभालेगा। क्योंकि तेजस्वी और तेजप्रताप में एक दूसरे को कमजोर करने की राजनीति का खेल चल रहा है। तेजप्रताप भले ही राजनीतिक उत्थान नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने तेजस्वी के बढ़ते कदमों पर बहुत बड़ा ब्रेक लगा दिया है। इसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि तेजप्रताप को खड़ा करने के लिए अंदर की राजनीति ही काम कर रही है। राजद में जो नेता तेजस्वी को नापसंद करते थे वे स्वाभाविक रूप से तेजप्रताप के पाले में खड़े हो गए। इसमें खास तथ्य यह भी है कि कई लोग खुलकर साथ थे तो कई राजनेता अंदर ही अंदर तेजस्वी की जड़ को काट रहे थे।

राष्ट्रीय जनता दल की सबसे बड़ी कमजोरी यह भी मानी जा सकती है कि लोकतांत्रिक चुनाव में क्या केवल लालू प्रसाद यादव का परिवार ही राजद का उत्तराधिकारी हो सकता है। क्योंकि लालू यादव के दोनों ही पुत्र अपने आपको खानदानी विरासत का उत्तराधिकारी मानने का दावा कर रहे हैं। हम यह जानते ही होंगे कि दो की लड़ाई में हमेशा तीसरे का ही फायदा होता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि राजद नेताओं की आपसी लड़ाई का लाभ भी दूसरे राजनीतिक दलों को ही हुआ होगा।

विपक्ष के सामने सबसे कठिन स्थिति यही थी कि जब प्रदेश में उनकी सरकार रही, तब के बिहार और वर्तमान बिहार की स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है। मतदाताओं ने इन दोनों स्थितियों का भी अध्ययन किया ही होगा। अब बिहार जंगलराज के टैग से बाहर निकल चुका है, इसलिए बिहार का मतदाता बिहार के लिए फिर से जंगलराज का टैग लगाने की मानसिकता में नहीं था। विपक्ष के पास इतना बोलने का सामर्थ्य भी नहीं था कि यह अपने शासन की उपलब्धियों को बताने का साहस कर पाता। दूसरा कांग्रेस सहित विपक्ष के दलों की ओर से वोट चोरी का मामला उठाकर हवा को अपनी ओर मोड़ने का प्रयास किया, लेकिन उसके प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। जो प्रमाण दिए गए, वह फुस्स हो गए।

मतगणना के बाद स्वाभाविक रूप से बिहार की राजनीति में फिर से भूचाल आना तय है। आपस में ही आरोप लगाने की राजनीति शुरू होगी। हार का ठीकरा फोड़ने की कवायद भी होगी। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि इसका ठीकरा हर बार की तरह ईवीएम पर फोड़ा जाए। इसके अलावा विपक्ष के पास वोट चोरी का मुद्दा तो पहले से ही तैयार है। विपक्ष के राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि जब घर में पराजित करने वाले पैदा हो जाएं, तब दूसरों को दोष देना उचित नहीं। अपनी स्वयं की स्थिति का आकलन करना ही चाहिए। कांग्रेस और राजद के पास अब आत्ममंथन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता।

Wednesday, November 27, 2024

*महाराष्ट्र और झारखण्ड में जनादेश के मायने*


सुरेश हिंदुस्तानी
देश के दो राज्यों के साथ कुछ राज्यों के उपचुनाव के परिणाम ने सत्ता पक्ष के प्रति अपना जनादेश दिया है। हर चुनाव में सत्ता के प्रति जनता में किसी न किसी बात पर आक्रोश रहता है, लेकिन महाराष्ट्र और झारखण्ड के चुनाव में ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया। जनता ने फिर से उन्हीं सरकारों को फिर से सत्ता संभालने की जिम्मेदारी दी है, जो सत्ता में थी। खास बात यह है कि महाराष्ट्र और झारखण्ड में सत्ता धारी गठबंधन को पहले से ज्यादा सीटें मिली हैं। यह जनादेश न तो किसी के उछलने का मार्ग तैयार करता है और न ही किसी को नकारने की स्थिति पैदा करता है। जहां तक खुशियाँ मनाने की बात है तो महाराष्ट्र में भाजपा नीत गठबंधन जीत की खुशी मना रहा है तो झारखण्ड में इंडी गठबंधन के गले में विजयी माला पहनाई गई है। वहीं उपचुनाव में सबको ख़ुशी और सबक दोनों ही दिए हैं।
महाराष्ट्र और झारखंड में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद अपने हिसाब से राजनीतिक विश्लेषण किए जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए इन चुनावों में प्रादेशिक रूप से जय और पराजय दोनों ही सन्देश प्रवाहित हो रहे हैं। किसी के लिए ख़ुशी तो किसी के लिए गम की स्थिति पैदा करने वाले परिणाम ने यह तो साबित कर दिया है कि देश में किसी एक राजनीतिक दल का न तो व्यापक प्रभाव है और न ही कम सीट प्राप्त करने वाले को कमतर आँका जा सकता है। इस चुनाव की सबसे ख़ास बात यह मानी जा सकती है कि कोई भी पार्टी अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा प्राप्त नहीं कर सकी, जिससे यह सन्देश निकल रहा है कि अब भविष्य की राजनीति की दिशा और दशा गठबंधन के सहारे ही तय होगी। वर्तमान में राजनीति दो विचार धाराओं के बीच है, जिसमें एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के साथ समन्वय बनाकर चलने वाले राजनीतिक दलों का विचार है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के विचारों से तालमेल रखने वाले दलों की बानगी है। इतना ही नहीं इन चुनावों एक दूसरे के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया गया, वह राजनीतिक हिसाब से भले ही जायज ठहराया जा सकता है, लेकिन आम नागरिकों के समक्ष भ्रम जैसी स्थिति को ही प्रादुर्भित करती हैं।
महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों  के परिणाम भाजपा के लिए निश्चित ही अच्छे कहे जा सकते हैं, लेकिन झारखण्ड में सरकार बनाने का सपना लेकर मैदान में उतरी भाजपा को फिर से तैयारी करनी होगी। झारखण्ड के परिणाम को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रति उपजी सहानुभूति को आधार बताया जा रहा है। पिछले दिनों झारखण्ड में हुए भ्रष्टाचार के आरोप में हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद से अलग होना पड़ा था। जिसके बाद हेमंत सोरेन ने चुनाव में इसी को अपना राजनीतिक हथियार बनाया था और चुनाव में अपने पक्ष में वातावरण बनाया। ऐसा लगता है कि झारखंड में भाजपा अपनी ताकत और कमजोरी को भाँपने में विफल हो गई। झारखण्ड में भाजपा इतनी अप्रभावी नहीं कही जा सकती, जैसा उसका इस चुनाव में प्रदर्शन रहा है। पिछले विधानसभा के चुनाव में भाजपा के प्रादेशिक नेताओं की तनातनी जगजाहिर थी, जिसका परिणाम भाजपा के लिए ठीक नहीं था। हालाँकि इस चुनाव में भाजपा ने पिछली गलती को सुधारने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह सत्ता के सीढ़ी का निर्माण कर पाने में असफल रही। अब झारखण्ड में फिर से झारखण्ड मुक्ति मोर्चा की सरकार बनेगी और मुख्यमंत्री के रूप में हेमंत सोरेन फिर मुख्यमंत्री होंगे, यह भी तय लगता है।
परिणाम के बाद अब महाराष्ट्र के चुनावों के बारे में जो राजनीतिक निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं, उसके अनुसार यही कहा जा रहा है कि झारखंड और महाराष्ट्र में राजनीतिक हवा अलग अलग दिशा में बह रही थी। जिसने हवा का रुख भांप लिया, वह हवा के साथ ही चला और सत्ता प्राप्त करने में सफलता हासिल की। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के साथ रहने वाले शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को जनता ने नकार कर शायद यही सन्देश दिया है कि यह सत्ता के लिए किया गया बेमेल गठबंधन ही था। महाराष्ट्र में ऐसे जनादेश का क्या अर्थ होना चाहिए कि एक गठबंधन जीत गया तो दूसरा गठबंधन हार गया। इसी प्रकार झारखण्ड में भी जनादेश की भी समीक्षा की जाने लगी है।
पिछले पांच साल में महाराष्ट्र में जिस प्रकार की राजनीतिक उठापटक हुई थी, उसके केंद्र में कौन था, यह ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता, लेकिन इंडी गठबंधन की मानें तो उसने इसका सारा ठीकरा भाजपा के मत्थे मढ़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। इस राजनीतिक धमा चौकड़ी में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिव सेना ने अपने विभाजन के रूप में चुकाई। जो धड़े अलग हुए वे भाजपा के साथ जाकर खड़े हो गए और महाराष्ट्र में सरकार बनाई। कहा जा रहा है कि जनादेश ने भाजपा के साथ वाली शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को असली होने का प्रणाम पत्र दे दिया है। अब महाराष्ट्र में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन की ही सरकार बनेगी, यह तय है, लेकिन मुख्यमंत्री कौन होगा, इसके कयास भी लगने लगे हैं, क्योंकि महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर भाजपा ने शानदार वापसी की है। ज्यादा उम्मीद इसी बात की है कि एकनाथ शिंदे ही फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे। इसके पीछे राजनीतिक कारण यह भी माना जा रहा है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सहयोगी दलों की जरुरत है, इसलिए भाजपा अपने सहयोगी दलों को अब नाराज नहीं कर सकती। दूसरी बात यह भी है भाजपा ने एकनाथ शिंदे को जिस प्रकार से चौकाने वाले अंदाज में मुख्यमंत्री बनाया था, वह हर किसी के लिए आश्चर्य ही था। अब यह भी हो सकता है कि भाजपा ने जिस प्रकार से पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को उप मुख्यमंत्री बनाया, वही प्रयोग शिंदे के साथ भी किया जा सकता है।

Friday, February 23, 2024

फिर राजनीतिक भंवर में पाकिस्तान

सुरेश हिंदुस्तानी
पाकिस्तान के बनने के पश्चात प्रारंभ से पैदा हुई उसकी राजनीतिक दुश्वारियां अभी तक पीछा नहीं छोड़ रही हैं। सत्ता के संघर्ष के इस खेल में पाकिस्तान ने पाया कुछ नहीं, इसके विपरीत खोया बहुत है। अभी हाल ही में हुए चुनाव में पाकिस्तान के राजनीतिक आसमान में फिर से अस्थिरता के बादल उमड़ते घुमड़ते दिखाई दिए। पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के संकेत पर जबरदस्ती पदच्युत किए गए पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए इस चुनाव में राह को कठिन बनाने की भरपूर राजनीति की गई। इसके बाद भी पाकिस्तान में एक बड़ी ताकत के रूप में अपना स्थान कायम रखा। इसे इमरान खान की लोकप्रियता ही कहा जाएगा कि उनके विरोधी दल ताल ठोककर मैदान में सामने खड़े थे, इसके बाद भी इमरान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आई। वहीं नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग नवाज दूसरे और बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी तीसरे स्थान को ही प्राप्त कर सके। इसके यह भी निहितार्थ हैं कि इन दोनों से इमरान खान ज्यादा लोकप्रिय हैं। जैसा कि पाकिस्तान का चरित्र रहा है कि वहां प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने वाला व्यक्ति तब तक कुछ नहीं कर सकता, जब तक सेना और आतंकी आकाओं का आदेश नहीं मिल जाए। इसे इस रूप में कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पाकिस्तान की सत्ता का निर्धारण सेना के हाथ में ही रहता है। पाकिस्तान में कहने को ही लोकतंत्र है, सच मायनों में वहां सेना का तंत्र ही कार्य करता है। सेना के अधिकारी जब चाहें जैसा चाहें, निर्णय कर सकते हैं। वहां सेना के मुख्य अधिकारी सत्ता को गिराने का काम करते आए हैं। उल्लेखनीय है कि परवेज मुशर्रफ सेना के अधिकारी ही थे, जिन्होंने पाकिस्तान में तख्तापलट करते हुए शासन की बागडोर संभाली थी। इसी प्रकार अन्य भी कई उदाहरण हैं।
यह पाकिस्तान की नियति बन चुकी है कि वहां अभी तक कोई भी राजनीतिक दल सत्ता का संचालन पूरे कार्यकाल तक नहीं कर सका है। क्योंकि वहां सरकार के कामों में सेना का हस्तक्षेप बहुत ज्यादा है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि पाकिस्तान में सेना ने ज्यादातर शासन किया है। एक प्रकार से पाकिस्तान बनने के बाद से ही सेना की राजनीतिक सक्रियता रही है। जिसके कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र होते हुए भी सैनिक शासन जैसा ही रहा है। इस बार के चुनाव में लोकतंत्र के हिसाब से इमरान खान काफी मजबूत दिखाई दे रहे थे, जो चुनाव के परिणामों ने भी स्पष्ट किया, लेकिन इमरान खान की पार्टी बहुमत के आंकड़े से बहुत दूर रही। इमरान खान की पार्टी के नेताओं ने दावा किया था कि उनकी पार्टी 150 से ज्यादा सीटों पर विजय प्राप्त कर रही है। यह आंकड़े मतों की गिनती होते समय प्रारंभिक रूप से दिखने लगे थे, लेकिन उसके बाद स्थिति अचानक से बदल गई। उसके जो उम्मीदवार आगे चल रहे थे, वे पीछे होते चले गए। इस चुनाव में एक बार फिर राजनीतिक विद्वेष की खाई और ज्यादा चौड़ी होती दिखाई दी। नवाज शरीफ के पार्टी ने अपने रास्ते साफ करने के लिए इमरान को जेल भेजने का कुचक्र रचा। इमरान को चार मामलों में सजा भी मिली है, जिसके कारण चुनाव के दौरान इमरान जेल में ही रहे। इसे चुनाव प्रचार से दूर करने की कवायद के रूप में देखा जा गया। इतना ही नहीं इमरान की पार्टी के नेताओं के सामने भी कई प्रकार के संकट खड़े किए गए। फिर भी इमरान को नहीं रोक सके। अब इमरान को रोकने के लिए एक बार फिर से पाकिस्तान गठबंधन सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ा चुका है। यानी फिर से पाकिस्तान में ऐसा राजनीतिक भंवर बन रहा है, जिसमें पाकिस्तान निकलने की कवायद कर रहा था।
पाकिस्तान में कहा यह भी जा रहा कि सेना के हस्तक्षेप के चलते इमरान को सत्ता के मुहाने पर आकर रोक दिया है। चुनाव परिणाम के बाद पाकिस्तान में इमरान के समर्थक सड़कों पर उतर आए और जमकर विरोध किया। इमरान समर्थकों की यह कवायद थम जाएगी, ऐसा फिलहाल तो नहीं लगता। इसलिए कहा यह भी जा रहा है कि पाकिस्तान में आगामी हालात राजनीतिक रूप से रस्सा कसी वाले ही रहेंगे। जिससे फिर जराजनीतिक अस्थिरता होगी और पाकिस्तान के बिगड़े हुए हालात और भी ज्यादा खराब होते जाएंगे, यह तय है।
आज पाकिस्तान की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। पाकिस्तान में भुखमरी के हालात हैं। इसका एक बड़ा कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र का गिरवी होना ही है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान में राजनेता मौज कर रही है और जनता दर दर की ठोकर खाने के लिए मजबूर है। शासन की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने देश की स्थिति को संभाले, परंतु पाकिस्तान में सरकार को संभालने की राजनीति ही की जाती रही है। जिसके कारण पाकिस्तान के ऐसे हालात बने। इतना ही वहां के राजनेता आतंकी आकाओं और सेना की कठपुतली ही बने रहे, जिसके चलते उनको सत्ता का सुख भी प्राप्त हुआ। पाकिस्तान की मौजूदा परिस्थितियां वहां के राजनीतिक नेताओं की देन हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान आज बर्बादी के कगार पर जा चुका है। हम जानते हैं कि इमरान के शासनकाल के दौरान जनता अपना पेट भरने के लिए सड़कों पर उतर आई। लूटपाट भी की, लेकिन राजनेताओं ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और पाकिस्तान की दुर्गति होती चली गई।
अब पाकिस्तान के हालात उससे भी बुरे हो सकते हैं, क्योंकि वहां जोड़ तोड़ करके जो सरकार बनेगी, उसके सामने एक मजबूत विपक्ष होगा, जो सरकार की निरंकुश कार्यवाही पर लगाम लगाने में समर्थ होगी। अब अगर पाकिस्तान को अपनी स्थिति सुधारना है तो उसे सत्ता की राजनीति करने की बजाय जनहित की राजनीति पर ध्यान देने पर बल देना होगा। तभी पाकिस्तान का संकट समाप्त हो सकेगा।
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सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

Wednesday, February 21, 2024

डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों का हुआ विमोचन

डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों का हुआ विमोचन
वर्तमान की युवा पीढ़ी अच्छे साहित्य का निर्माण कर रही है : डॉ. विकास दवे
ग्वालियर। भारतीय संस्कृति के उदात्त चिंतन पर आधारित साहित्य सृजन करने वाली ग्वालियर की साहित्यकार एवं शिक्षाविद डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों का विमोचन समारोह एक भव्य समारोह में किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे, मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुरेश सम्राट एवं सारस्वत अतिथि पीजीवी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. विजय कुमार गुप्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रेमचंद सृजन पीठ के पूर्व निदेशक आचार्य जगदीश तोमर ने की। सरस्वती वंदना का वाचन अर्चना बामनगया ने किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. विकास दवे ने अत्यंत सारगर्भित और सामयिक स्थितियों पर अपने विवेकपूर्ण उद्बोधन में कहा कि आजकल विमर्श के नाम पर समाज और परिवार को बांटा जा रहा है। भारतीय साहित्य भी विमर्श में उलझता जा रहा है। दलित विमर्श को समरसता विमर्श में बदलने की जरूरत है। इससे भारतीय आत्मा और चेतना अपने आप प्रगट होने लगेगी। वे राष्ट्रोत्थान न्यास के विवेकानंद सभागार में आयोजित डॉ. वंदना सेन की दो पुस्तकों के विमोचन समारोह में अपना संबोधन दे रहे थे।
मप्र साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित डॉ. वन्दना सेन की पुस्तक आलेख संग्रह उदात्त चेतना और काव्य संग्रह एक नया प्रकाश के विमोचन समारोह के मुख्य वक्ता श्री दवे ने कहा कि वर्तमान की युवा पीढी अच्छे साहित्य का निर्माण कर रही है। पार्वतीबाई गोखले विज्ञान महाविद्यालय की प्राध्यापक डॉ. वंदना सेन को भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर पुस्तकें लिखने के लिए उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए निरंतर इस पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। कार्यक्रम का संचालन राजेश वाधवानी एवं आभार प्रदर्शन ज्योति दोहरे ने किया।
इस मौके पर प्रमुख रूप से देश के प्रसिद्ध कवि तेज नारायण शर्मा बेचैन, अनिल अग्निहोत्री, स्वदेश के समूह संपादक अतुल तारे, स्थानीय संपादक दिनेश राव, डॉ. कुमार संजीव, राजकिशोर वाजपेयी, धीरज शर्मा, डॉ. कमल जैन, डॉ. सुनील पाठक, धीरेंद्र भदौरिया, दिनेश चाकणकर, डॉ. सुखदेव माखीजा, डॉ. पदमा शर्मा, डॉ. मंदाकिनी शर्मा, डॉ. निशांत शर्मा, सुनीता पाठक, करुणा सक्सेना, डॉ. ज्योति उपाध्याय, डॉ. शिवकुमार शर्मा, डॉ. आनंद शर्मा, डॉ. ज्योत्सना सिंह, डॉ. विनोद केशवानी, डॉ. मंजुलता आर्य, महिमा तारे, राजीव अग्रवाल, गोपाल लालवानी, उपेंद्र कस्तूरे, जवाहर प्रजापति, शर्मिला सोनी, आशा त्रिपाठी, व्याप्ति उमड़ेकर, जान्हवी नाईक, मनीष मांझी, उदयभान रजक, आशीष पांडे, रमेश छत्रशाली, उपस्थित रहे।
दृष्टि तय करने से मिलती है सफलता : डॉ. सुरेश सम्राट
मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ. सुरेश सम्राट ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में दृष्टि और मानदंड तय करने से सफलता मिलती है। डॉ. वंदना सेन की दोनों पुस्तकों में राष्ट्रीय भाव का संचेतन तो है ही साथ ही वह समाज को सही दिशा का बोध भी कराती हैं। उन्होंने कहा कि ग्वालियर में हिंदी साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकारों को निखारने का काम किया है।
अच्छी पुस्तकें आज भी पढ़ी जाती हैं : जगदीश तोमर
प्रेमचंद सृजन पीठ मध्यप्रदेश के पूर्व निदेशक जगदीश तोमर ने अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए कहा कि यह सही बात है कि आजकल लोगों में पढ़ने की रुचि कम हुई है, लेकिन अच्छी पुस्तकें आज भी पढ़ी जाती हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य पुरातन काल से समृद्ध रहा है और इसे आगे बढ़ाने का काम अब युवा साहित्यकारों का जारी रखना चाहिए। सारस्वत अतिथि पीजीव्ही महाविद्यालय ग्वालियर के प्राचार्य डॉ. विजय कुमार गुप्ता ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि डॉ. वंदना सेन ने भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर दो पुस्तकें लिखकर हमारे महाविद्यालय का नाम रोशन किया है।

Wednesday, February 14, 2024

मस्तिष्क की संरचना से महसूस होता है ज्यादा दर्द

मस्तिष्क की संरचना से महसूस होता है ज्यादा दर्द

मस्तिष्क की संरचना से महसूस होता है ज्यादा दर्दलंदन : आपने कभी सोचा है कि एक ही तरह की चोट लगने के बावजूद अलग-अलग लोगों को दर्द का एहसास अलग तरीके से क्यों होता है ? वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्क की बनावट में अंतर के कारण लोगों को दर्द का एहसास अलग-अलग तरीके से होता है।

शिकागो की ‘नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी’ की प्रोफेसर वानिया अपाकारियन ने नेतृत्व में अध्ययन क
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र रहे दल ने पाया कि चोटों के प्रति लोग किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे यह मस्तिष्क के भावनात्मक स्तर पर निर्भर करता है।

उन्होंने पाया कि जो अपनी चोट से भावनात्मक तरीके से जितना ज्यादा जुड़ा होता है उसे दर्द का एहसास उतना ही ज्यादा होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अपाकारियन का कहना है कि चोट अपने आप में दर्द महसूस करने के लिए काफी नहीं है। दर्द चोट और मस्तिष्क की अवस्था से जुड़ा होता है। (एजेंसी)

चकनाचूर होता विपक्षी एकता का सपना

चकनाचूर होता विपक्षी एकता का सपना

सुरेश हिन्दुस्थानी

लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां होती हैं। लेकिन जब विपक्ष के पास संख्या बल का अभाव होता है तो वह घायल शेर की तरह से दिखाने का प्रयास करता है। इसी दिखावे के प्रयास में कई बार ऐसी चूक हो जाती है कि उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। संसद में विपक्षी दल तेलगुदेशम पार्टी की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष की जिस प्रकार से किरकिरी हुई, उसकी कसक विपक्षी राजनीतिक दलों को लम्बे समय तक रहेगी। लोकसभा में पर्याप्त संख्याबल न होने के बाबजूद अविश्वास प्रस्ताव को लाना किसी भी प्रकार से न्याय संगत नहीं कहा जा सकता। इस प्रस्ताव को भले ही तेलगुदेशम पार्टी की ओर से लाया गया, लेकिन इसके केन्द्र में कांग्रेस पार्टी के नेता ही दिखाई दिए। विरासती पृष्ठ भूमि के उपजे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने आपको देश के सामने एक परिपक्व राजनेता के रुप में प्रस्तुत करने का राजनीतिक खेल खेला। इसे राहुल गांधी का राजनीतिक अभिनय कहा जाए तो भी ठीक ही होगा, क्योंकि इससे पूर्व कई लोग राहुल गांधी को पप्पू जैसे संबोधन दे चुके हैं।
यह बात सही है कि अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में दोपहर में जब राहुल गांधी अपना वक्तव्य दे रहे थे, उस समय पूरे देश के विपक्षी दलों में एक आस बनती दिखाई दी कि राहुल गांधी अब परिपक्व राजनेता की श्रेणी में आ रहे हैं। समाचार चैनलों में चली बहस में भी राहुल गांधी के नए उदय को नए ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा था, लेकिन जैसे ही समय निकलता गया राहुल गांधी की वास्तविकता देश के सामने आने लगी। राहुल गांधी ने अपने आपको एक बार फिर से पप्पू होने का प्रमाण दे दिया। पहली बात तो यह है कि राहुल गांधी जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से गले मिले, वह जबरदस्ती पूर्वक गले मिलना ही था, क्योंकि इसके लिए संसद उचित स्थान नहीं था।
सबसे बड़ी बात यह भी है कि राहुल गांधी सरकार पर आरोप लगाते समय यह भूल जाते हैं कि वर्तमान सरकार जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है। यानी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार है, इसलिए राहुल गांधी को कम से कम लोकतंत्र का सम्मान तो करना ही चाहिए। राहुल गांधी वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इसलिए उन्हें अपने पद की गरिमा का भी ध्यान रखना चाहिए। ऐसे आरोप लगाने से उन्हें बचना चाहिए, जिनका कोई आधार नहीं है। हम जानते हैं कि राहुल गांधी ने राफेल मुद्दे पर जो वक्तव्य दिया था, वह सार्वजनिक करने वाला नहीं था, क्योंकि रक्षा मामले बेहद संवेदनशील होते हैं, उन्हें उजागर करना भी ठीक नहीं होता, लेकिन राहुल गांधी ने ऐसा किया, जो ठीक नहीं था। अगर राहुल गांधी को संसदीय मर्यादाओं का ज्ञान नहीं है तो उन्हें पहले इनका अध्ययन करना चाहिए, नहीं तो वह नादानी में भविष्य में भी ऐसी ही गलती करते जाएंगे और कांग्रेस पार्टी की जो वर्तमान हालत है वह और खराब होती चली जाएगी। कहा जाता है कि आज कांग्रेस के समक्ष जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ है, उसके लिए कांग्रेस के नेता ही जिम्मेदार हैं, और कोई नहीं। चार वर्ष पहले जिस केन्द्र सरकार का अंत हुआ, उसके कार्यकाल से जनता प्रताड़ित थी, घोटाले होना तो जैसे सरकार की नियति ही बन गई थी। संप्रग सरकार के कार्यकाल में हुए घोटाले के कई प्रकरण आज न्यायालय में विचारधीन हैं। कांग्रेस अगर स्वच्छ प्रशासन देने की बात करती है तो इसके प्रति फिलहाल जनता में विश्वास का भाव पैदा नहीं हो सकता। इसके लिए कांग्रेस को अपने आपको बदलना होगा और कांग्रेस का चाल, चरित्र और चेहरा बदल जाएगा, ऐसा अभी लगता नहीं है।
वास्तवविकता यह भी है कि जिस अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से विपक्ष सरकार को घेरने की योजना बना रहा था, उसमें किसी प्रकार का कोई वजन नहीं था, यह विपक्षी भी भलीभांति जानते थे। इतना ही नहीं उनको अपना संख्या बल भी पता था, फिर भी उन्होंने केवल अपनी राजनीति चमकाने के उद्देश्य से इस अविश्वास प्रस्ताव को रखा। बाद में क्या हुआ यह सभी को पता है। जितनी उम्मीद थी, उतना भी समर्थन इस प्रस्ताव को नहीं मिला और औंधे मुंह गिर गया। जबकि कांग्रेस पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जोर देते हुए कहा था कि हमारे पास अविश्वास प्रस्ताव लाने के पर्याप्त कारण हैं और हमारे पास संख्या संख्या बल है। इसे कांग्रेस का सबसे बड़ा झूठ भी कहा जा सकता है। इससे ऐसा ही लगता है कि कांग्रेस नेता झूठ बोलकर देश की जनता को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। राहुल गांधी ने भी राफेल मामले में संसद में झूठ बोला। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को ऐसे झूठ बोलने से बचना चाहिए।
इस अविश्वास प्रस्ताव के निर्णय के बाद राजग सरकार पर तो कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन विपक्ष द्वारा जिस प्रकार से सत्ता की तड़प को उजागर करने वाली राजनीति की जा रही थी, उसको जरुर गहरा आघात पहुंचा है। अब यह तय सा लगने लगा है कि विपक्षी गठबंधन की जो कवायद देश में चल रही थी, उसमें दरार पड़ेगी। क्योंकि इससे कांग्रेस का वास्तविक आधार देश के सामने आ गया। वर्तमान में कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति का आकलन किया जाए तो ऐसा ही लगता है कि कांग्रेस के पास उतनी भी ताकत नहीं है, जितनी चार वर्ष पूर्व थी। इसके पीछे तर्क यही दिया जा सकता है कि चार वर्ष पहले कांग्रेस के प्रति अच्छा रवैया रखने वाले कई सांसद थे, आज उन सांसदों की संख्या में कमी आई है। अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में संप्रग के पूरे सांसदों ने भी साथ नहीं दिया। इसका आशय यह भी है कि भविष्य में कई राजनीतिक दल संप्रग से नाता तोड़ सकते हैं। ऐसे में जिस प्रकार से विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा गठबंधन की कवायद की जा रही है, वह कमजोर ही होगा। कोई भी राजनीतिक दल कांग्रेस के साथ आने को तैयार नहीं होगा। हां, इतना अवश्य हो सकता है कि जिन राजनीतिक दलों को भाजपा का भय होगा या अपने भविष्य के प्रति संदेह होगा, वह जरुर इस मुहिम का हिस्सा बन सकता है, लेकिन यह एक बार फिर से प्रमाणित हो गया है कि देश में विपक्ष अभी मजबूत विकल्प नहीं बन सका है। सरकार मजबूत है, यह संसद ने भी बता दिया है और जनता भी बता रही है।
आज देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति का अध्ययन किया जाए तो यही दिखाई देता है कि कांग्रेस पार्टी को देश के कई क्षेत्रीय दल अपने स्तर का भी नहीं मान रहे हैं। यह सच भी है कि कई राज्यों में क्षेत्रीय दल आज कांग्रेस से ज्यादा प्रभाव रखते हैं। ऐसे में वह कांग्रेस को कितना महत्व देंगे, इसका पता चल ही जाता है। कांग्रेस की मजबूरी यह है कि वह कई राज्यों में अपने स्वयं की ताकत के सहारे चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकती, इसलिए उसे कई राज्यों में सहारे की आवश्यकता महसूस हो रही है। कर्नाटक में भी यही दिखाई दिया, कांग्रेस ने अपने से कम राजनीतिक प्रभाव रखने वाले दल को राज्य की सत्ता सौंप दी। इसी प्रकार के हालात उत्तरप्रदेश में बन रहे हैं, यहां अभी गठबंधन बना ही नहीं, दरार के संकेत मिलने लगे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)
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सुरेश हिन्दुस्थानी
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माँ की ममता का कोई मुकाबला नहीं 

माँ की ममता का कोई मुकाबला नहीं 

बहुत समय पहले मैंने एक फ़िल्म देखी थी। फ़िल्म का नाम था दीवार। इस फ़िल्म की कहानी कितनी ही सही हो लेकिन फ़िल्म की एक लाइन लंबे समय तक याद की जाती है, जिसमें अभिनेता शशि कपूर अपने भाई अमिताभ बच्चन से कहते थे कि मेरे पास माँ है। यह भले ही एक लाइन की बात कही जा सकती है, लेकिन पूरी फ़िल्म में केवल इसी एक संवाद की बात होती है, अभी तक होती आ रही है और आगे भी होगी, ऐसा अकाट्य विश्वास है। वास्तव में भारतीय संस्कृति में माँ शब्द में एक ऐसा अपनापन है। जिसमें ममता की गहराई है, वात्सल्य का ऐसा अमूल्य खजाना है, जो दुनिया में कहीं अन्यत्र नहीं मिल सकता। इसीलिए हमारे महापुरुषों ने माँ को भगवान का दर्जा दिया है, वहीं किसी भी बच्चे के लिए प्रथम गुरु भी केवल माँ ही है। वास्तव में आज के वातावरण में भी माँ की अद्भुत ममता का कोई मुकाबला नहीं है। कहते हैं किसी व्यक्ति के पास दुनिया की सारी दौलत है और माँ नहीं है, तो वह दुनिया का सबसे बड़ा गरीब आदमी है। दुनिया में धन तो परिश्रम करके भी कमाया जा सकता है, लेकिन माँ का प्यार पैसे से कभी नहीं खरीदा जा सकता है।
कहते हैं भगवान हर समय हर जगह उपलब्ध नहीं हो सकता हैं, इसी लिए भगवान ने माँ को बनाया हैं। हालांकि माँ की महानता को प्रदर्शित करते हुए बहुत कुछ लिखा जा चूका है, पढाया जा चुका हैं पर फिर भी माँ की महिमा इतनी अपरंपार है की फिर भी सब कम ही लगता हैं। वास्तव में माँ की महानता के लिए शब्द दे पाना अत्यंत ही दुष्कर कार्य है, मेरी ओर से माँ की ममता को व्यक्त करने का एक लघुतम प्रयास है, एक ऐसा प्रयास जैसे सूरज को दीपक दिखाना।
एक माँ क्या होती है, वह अपने बच्चे की कितनी चिंता करती है, मुझसे अच्छा कोई नहीं जान सकता। मेरे लिए मेरी माँ ने जो किया है, जितना किया है। वास्तव में वह त्याग कोई नहीं कर सकता। मेरे लिए मेरी माँ भगवान से भी बढ़कर है। लिखने को तो बहुत लिख सकता हूँ, इतना लिख सकता हूँ कि मेरा सामर्थ्य भी कम लगने लगेगा, इसलिए मैं तो यही कहूँगा कि माँ के बारे में लिखना किसी भी लेखक के लिए कठिन ही होगा।
कोई भी माँ हो, माँ सबसे बड़ी होती है। बेटा कितना भी बड़ा हो जाए लेकिन माँ के सामने बेटा हमेशा बच्चा ही रहता है। माँ का उपकार बच्चे पर पूरी उम्र तक बना रहता है। जो माँ मरके भी अपने बच्चे के आसपास रहती है। उसकी हर प्रकार से रक्षा करती है। ऐसा दृश्य हम सभी ने माँ फ़िल्म में देखा भी है। यह है तो एक फ़िल्म का हिस्सा, लेकिन यह सत्य है, मैंने महसूस किया है। मुझे आज भी लगता है कि मेरी माँ आज भी मेरे आसपास है, जो मेरी रक्षा करती है।
भारत में हर वर्ष मई के महीने के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता हैं। ऐसे तो हर दिन माँ की पूजा की जानी चाहिए पर माँ का महत्त्व ओर उनके त्याग के प्रतीक में यह दिन खास तौर पर मनाया जाता हैं। भारत में माँ को पूजने के लिए एक दिन नहीं, पूरी जिंदगी लोग लगा देते हैं। कहा जाता है कि माँ की ममता अनमोल है, उसकी कीमत कोई नहीं चुका सकता है। जन्म से पूर्व भी माँ हमको नौ महीने तक संभाल कर रखती है।
एक बालक माँ के गर्भ में रहता है उस समय से ही पोषण के साथ कई तरह की चीजे अपने माँ से सीखता हैं। मैंने अपने जीवन में कई सारी बाते अपनी माँ से सीखी हैं। हमेशा प्रेम करने वाली माँ कभी-कभी कठोर भी होती है तो सिर्फ अपने बच्चो के भलाई के लिए ही। मुझे इस बात की ख़ुशी हैं की मेरी माँ आज भी मेरे साथ हैं ओर उनके स्नेह ओर आशीर्वाद की शक्ति हमेशा मेरे पास हैं। माँ के उपकारो का वर्णन करना तो असंभव है।
हम यह भली भाँती जानते हैं कि माँ बाप ने हमें आज इस लायक बनाया है, माँ नहीं होती तो हम इस धरती पर भी नहीं होते। लेकिन वर्त्तमान में हम माँ बाप की सेवा से विमुख होते जा रहे हैं। देश में वृद्धाश्रम में अनेक बुजुर्ग अपने बच्चों की अकर्मण्यता को दिखा रहे हैं, इसके बाद भी माँ के दिल में बच्चे के लिए जगह होती है।

पाश्चात्य दिशा की ओर बढ़ता भारत

सुरेश हिन्दुस्थानी
देश में यूं तो कई प्रकार के भारत विरोधी षड्यंत्र हो रहे हैं, लेकिन कुछ षड्यंत्र ऐसे भी हैं, जो सीधे तौर पर हमारे स्वर्णिम अतीत पर प्रहार कर रहे हैं यानी सीधे शब्दों में कहा जाए तो भारत की संस्कृति पर कुठाराघात कर रहे हैं। यह बात सही है कि विश्व के सभी देश अपनी स्वयं की पहचान को संरक्षित और संवर्धित करते हैं, लेकिन हमारे देश भारत में जैसा विदेशियों ने कह दिया, वैसा ही हम स्वीकार करने की मुद्रा में दिखाई देते हैं। यहां प्रश्न यह आता है कि क्या हमारा स्वत्व नहीं है। क्या हमारे देश की पहचान नहीं है? अगर है तो हम उसको बचाने के लिए कितनी ईमानदारी से प्रयास कर रहे हैं? नहीं कर रहे तो इसे किसकी कमी कहा जाएगा। भारत की सांस्कृतिक विशेषताओं के बारे में कहा जाए तो कई प्रमुख विशेषताएं हैं, जो भारत की एकता को स्थापित करती हैं। इतना ही नहीं भारत प्राकृतिक रुप से अत्यंत ही खूबसूरत देश है। पुरातन काल में भारत की सांस्कृतिक पंरपराओं ने पूरे विश्व को ज्ञान का दर्शन कराया था, लेकिन आज यह वर्जनाएं टूट रही हैं। हमने अपने आपको भुला दिया है, हम विदेश की जकड़न में फंसते जा रहे हैं। हमारा समाज सर्वकल्याण की भावना जगाने वाली संस्कृति से पीछा छुड़ा रहा है। जब हम ऐसा करेंगे तो हम कहां जाएंगे और हम आने वाली पीढ़ी को कौन सा भारत देकर जाएंगे। यह गंभीरता पूर्वक विचार करने का विषय है।
यहां विचार करने वाली बात यह भी है कि जो समूह भारत की संस्कृति पर कुठाराघात करने का प्रयास कर रहा है, उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित कौन कर रहा है? कभी-कभी तो ऐसा भी सुनने में आता है कि विश्व में जितने भी भारत के दुश्मन देश हैं, उन्होंने अपने लिए जयचंदों की तलाश करली है और उन्ही जयचंदों के माध्यम से वह भारत को तार-तार करने की मुद्रा में हैं। कहा यह भी जा रहा है कि इन जयचंदों को ऐसा करने के लिए बहुत बड़ी धनराशि भी प्राप्त हो रही है। पहले आतंकी घटनाओं के रुप में हमारे देश को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन अब ऐसा करने वालों ने भारत को कमजोर करने का तरीका बदल दिया है। अब बौद्धिक आतंकवाद के माध्यम से भारत के वातावरण में जहर पैदा करने का काम किया जा रहा है।
अभी कुछ दिनों पहले देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था उच्चतम न्यायालय ने एक अप्रवासी ईसाई जोसेफ शाइन की याचिका पर धारा 377 को समाप्त कर दिया। हो सकता है कि यह धारा हटाने से देश के मात्र कुछ ही लोगों को अच्छा लगा होगा, लेकिन इसे सभी के लिए हटाया गया है। यह बात सही है कि इस धारा को हटाने के लिए सम्पूर्ण भारतीय समाज की मांग नहीं थी। समलैंगिकता पश्चिमी जगत से आयातित शब्द है, भारत में इसकी आवश्यकता है ही नहीं, लेकिन जो भारत को कमजोर करने वाली ताकतें हैं, वह इसी प्रकार का भाव का प्रवाह देश में पैदा करना चाहती हैं।
भारत में सबसे बड़ी विसंगति यही है कि इस प्रकार के निर्णय के बाद भी भारतीय समाज चुपचाप अपनी संस्कृति पर हुए हमले को सहन कर रहा है। ऐसा निर्णय किसी अन्य समाज के बारे में हुआ होता तो हो सकता था कि ऐसा निर्णय बदल भी सकता था। जो काम पहले धारावाहिक निर्माता एकता कपूर के शो दिखा रहे थे, आज देश की सर्वोच्च संस्था ने भी दिखा दिया है। हम एक बार फिर कह रहे हैं कि ऐसा प्रश्न उठाकर हम सर्वोच्च न्यायालय की मंशा को गलत नहीं ठहरा रहे हैं, लेकिन जब समाज की ओर से कोई आवाज उठती है तो उसे विधायिका और न्यायपालिका तक पहुंचाने का कार्य भी होना चाहिए। क्या जनमानस में उठ रहा यह सवाल उचित नहीं है कि धारा 497 की समाप्ति के निर्णय से देश में अवैध व्यभिचार करने की खुली मान्यता मिल गई है। सवाल यह भी है कि ऐसे वातावरण में हम भविष्य की पीढ़ी के लिए कैसे भारत का निर्माण कर रहे हैं। ऐसी स्थिति के बाद हमारे भारत का सांस्कृतिक स्वरुप विदेशी विकृति के रुप में उपस्थित हो जाएगा। जो भारत के लोगों को शरीर से भारतीय, चरित्र से अंग्रेज और आत्मा से अमेरिकन बनाने का काम करेगा। पहले से ही मैकाले शिक्षा पद्धति अंदर से चरित्रहीनता भर ही रही थी। अब चरित्रहीनता बढ़ाने के सारे रास्ते खुल गए हैं। 
भारत में दोनों धाराएं 377 और 497 को खत्म करना भारत को पश्चिमी सभ्यता की ओर बढ़ाता है जो कामवासना, चरित्रहीनता, वेश्यावृति और व्याभिचार को बढ़ावा देकर भारतीय सभ्यता को खत्म करने का षड्यंत्र है। भारतीय सभ्यता में पर पुरूष गमन, पर स्त्री गमन को पाप और अमान्य माना गया है तो इस सभ्यता के एक पुरुष एक पत्नी के आदर्श को विखंडित करने के प्रयास कानूनपालिका कैसे चल रही है?
कामवासना, वेश्यावृति और व्याभिचार को बढ़ावा देकर भारत की संस्कृति, मर्यादा, संयम, विश्वास, आदर्श को रुढ़िवाद के नाम पर, आधुनिक सोच के नाम पर भारतीयता से दूर करके पश्चिमी सभ्यता पर ले जाया जा रहा है।
27 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने बड़ी चतुराई और सुनियोजित ढंग से एक के बाद एक निर्णय दिए। जिसमें पहला फैसला था धारा 497 को खत्म करना अर्थात अब विवाह के बाद पर पुरुष गमन, पर स्त्री गमन साधारण भाषा मे कहें तो पति के अलावा गैर मर्दों से शारीरिक सम्बन्ध बनाना कानूनन अपराध नहीं है। धारा 377 को खत्म कर वासना के लिए समलैंगिकता जैसी विकृति को स्वीकृति इसी महीने मिली और अब व्यभिचार को भी लीगल बना दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 377 के बाद अब धारा 497 पर फैसला सुनाया गया है। इस धारा के अंतर्गत व्यभिचार करते हुए कोई व्यक्ति पाया जाता तो दण्डित किया जा सकता था। इस धारा को हटाने के लिए हमारे देश में एक विशेष गुट कार्य कर रहा है। यह गुट देशवासियों को पशुतुल्य आचरण करने की छूट देना चाहता है। विडंबना यह है कि इस गिरोह के सुनियोजित षड्यंत्र को जानते हुए भी हम एकजुट होकर इनका विरोध नहीं कर पा रहे हैं। पिछले 15-20 वर्षों में इस गिरोह की हरकतें अनेक प्रकार से सामने आ रही हैं। जैसे मीडिया के माध्यम से बढ़ी अश्लीलता, लिव-इन-रिलेशनशिप, समलैंगिकता, पिंजरातोड़, विवाहेत्तर सम्बन्ध, विवाहपूर्व सम्बन्ध, विद्यालयों में सेक्स एजुकेशन।  जिसके परिणाम निर्भया बलात्कार, छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर वृद्ध महिलाओं से बलात्कार, बच्चों का यौन शोषण, सनकी आशिक के नाम पर लड़कियों पर हमला, एसिड अटैक, युवाओं में बढ़ते तलाक, कोर्ट-केस आदि के रूप में सामने आ रहे हैं। ऐसे समाज में परिवार समाप्त हो जाएंगे। सभी पशुतुल्य हो जाएंगे। समाज में विघटन हो जाएगा। यही विदेशी ताकतें चाहती हैं।
हमारे देश की संस्कृति के प्राण ही संयम और सदाचार रूपी आचरण में हैं। समलैंगिकता और स्वच्छंद व्यभिचार पर खुली छूट इसी सदाचार रूपी आचरण के विपरीत व्यवहार हैं। इसका परिणाम न केवल सामाजिक है अपितु आध्यात्मिक भी है। आत्म संयम धर्म का प्रदाता ईश्वर है। वेद इसी सन्देश को बड़े भव्य रूप से समझाते हैं।
पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता के दुष्प्रभाव से देश की संस्कृति का ह्रास होता जा रहा है। विदेशी चैनल, चल-चित्र, अश्लील साहित्य आदि प्रचार माध्यमों के द्वारा युवक-युवतियों को गुमराह किया जा रहा है। विभिन्न सामयिकों और समाचार-पत्रों में भी तथाकथित पाश्चात्य मनोविज्ञान से प्रभावित मनोचिकित्सक और सेक्सोलॉजिस्ट युवा छात्र-छात्राओं को चरित्र, संयम और नैतिकता से भ्रष्ट करने पर तुले हुए हैं। ऊपर ये ऐसा कानून बन जाए कि व्यभिचार करना कानून अपराध नहीं है तो फिर भगवान ही रक्षा करें। भारतवासियों को एकजुट होकर भारतीय संस्कृति को खत्म करने वाले कानूनों का विरोध करना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

दागी नेताओं पर लगाम से सुधरेगी राजनीति

दागी नेताओं पर लगाम से सुधरेगी राजनीति

सुरेश हिन्दुस्थानी
हमारे देश में जिस प्रकार से राजनीति में अपराध व्याप्त होता जा रहा है, उसके कारण सज्जन व्यक्तियों के लिए राजनीति में कोई जगह नहीं है। ऐसे में सवाल यह आता है कि जब राजनीति से सज्जनता समाप्त हो जाएगी, तब देश में कैसी राजनीति की जाएगी। इसका विश्लेषण किया जाए तो राजनीति का घातक स्वरुप का ही आभास होता है। देश में कई बार अपराधियों के राजनीति में प्रवेश प्रतिबंधित करने की मांग की गई, लेकिन जब राजनेता ही अपराध में लिप्त हों तो उनसे यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह राजनीति के शुद्धीकरण का समर्थन करेंगे। आज देश में कई राजनेता ऐसे हैं जिन पर कई प्रकार के आपराधिक आरोप लगे हैं, इतना ही नहीं कई नेताओं पर आरोप सिद्ध भी हो चुके हैं। इसके बाद भी वे सक्रिय राजनीति में भाग ले रहे हैं और चुनाव भी लड़ रहे हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इसका प्रमाण हैं। उन पर आरोप ही सिद्ध नहीं हुआ, बल्कि उन्हें सजा भी मिल चुकी है। हालांकि सजा के बाद वे चुनाव नहीं लड़े, लेकिन चुनाव में प्रमुख भूमिका का निर्वाह किया।
राजनीति में बढ़ रहे अपराधीकरण को लेकर अब चुनाव आयोग भी सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। वास्तव में वर्तमान राजनीतिक स्वरुप को देखते हुए यह आसानी से कहा जा सकता है कि देश में बढ़ रहे सभी प्रकार के अपराधों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से समर्थन मिलता रहा है। इसी कारण से अपराधी प्रवृति के व्यक्ति भी आज राजनीति का आसरा लेते हुए दिखाई दे रहे हैं। इससे राजनीति का स्वरुप भी बिगड़ता जा रहा है। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई एक याचिका के सुनवाई के दौरान स्पष्ट रुप से कहा कि दागी नेताओं के चुनाव लड़ने पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। चुनाव आयोग की यह मंशा निश्चित रुप से वर्तमान राजनीति को सुधारने का एक अप्रत्याशित कदम है। वर्तमान में देखा जा रहा है कि देश के कई सांसद और विधायकों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, इतना ही नहीं कई नेताओं को दोषी भी ठहराया जा चुका है, लेकिन इसके बाद भी वे चुनाव में तो भाग लेते ही हैं, खुलेआम चुनाव प्रचार भी करते हैं। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर यह सवाल आता है कि आपराधिक छवि रखने वाले नेता किस प्रकार की राजनीति करते होंगे। यह भी स्वाभाविक है कि जो जैसा होता है, वह वैसे ही लोगों को पसंद करता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि आपराधिक छवि वाले राजनेता निसंदेह राजनीति में अपराध को ही बढ़ावा देने वाले ही सिद्ध होंगे। अगर देश में राजनीति को अपराध मुक्त करना है तो सबसे पहले यही जरुरी है कि राजनीति से अपराध के संबंधों को समाप्त किया जाए। चुनाव आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से की गई मांग आज समय की आवश्यकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार से यह भी कहा है कि राजनेताओं के प्रकरणों के निपटारे के लिए विशेष न्यायालयों के गठन की कार्यवाही की जानी चाहिए। ये विशेष अदालतें केवल नेताओं के प्रकरणों की सुनवाई करें और उनका जल्दी निपटारा करें। न्यायालय ने विशेष अदालतें गठित करने पर छह सप्ताह में सरकार को योजना पेश करने को कहा है। इसके साथ ही न्यायालय ने चुनाव लड़ते समय नामांकन में आपराधिक मुकदमों का ब्यौरा देने वाले 1581 विधायकों और सांसदों के मुकदमों का ब्योरा और स्थिति पूछी है। इसके अंतर्गत उन राजनेताओं से उनके प्रकरणों की वर्तमान स्थिति मांगी गई है। ऐसे सभी नेताओं पर चुनाव आयोग ने रोक लगाने की मांग की है। ऐसा होने पर अपराधी प्रवृति के राजनेता कभी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने से वंचित किया जाएगा। अभी तक नियम यह था कि सजा पूरी होने के बाद जेल से छूटने पर केवल छह साल के लिए चुनाव लड़ने पर ही प्रतिबंध रहता था। चुनाव आयोग की पूरी हो जाने पर ऐसे नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लग जाएगा।
दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए और राजनीति को अपराध मुक्त करने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि आपराधिक प्रवृति के नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका जाए। इतना ही नहीं ऐसे नेताओं को चुनाव प्रचार करने से भी रोकना बहुत जरूरी है। चुनाव आयोग की तरह ही सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी भी यही प्रमाणित कर रही है कि वह भी अपराध से राजनीति को मुक्त करने की मंशा रखता है। ऐसा ही भाव प्रदर्शित करने वाला बयान केन्द्र सरकार की ओर से दिया गया है। यानी सभी राजनीति को शुद्ध करना चाहते हैं, लेकिन वे कभी नहीं चाहेंगे जो राजनीति को माध्यम बनाकर अपराध को बढ़ावा देते हैं।
सुनवाई के दौरान जब केन्द्र सरकार की ओर से पेश एडीशनल सालिसीटर जनरल एएनएस नदकरणी ने कहा कि सरकार राजनीति से अपराधीकरण दूर करने का समर्थन करती है। सरकार नेताओं के मामलों की सुनवाई और उनके जल्दी निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन का विरोध नहीं करती। हालांकि जब कोर्ट ने विशेष अदालतों के गठन के लिए ढांचागत संसाधन और खर्च की बात पूछी तो नदकरणी का कहना था कि विशेष अदालतें गठित करना राज्य के कार्यक्षेत्र में आता है। इस दलील पर नंदकरणी को टोकते हुए पीठ ने कहा कि आप एक तरफ विशेष अदालतों के गठन और मामले के जल्दी निस्तारण का समर्थन कर रहे हैं और दूसरी तरफ विशेष अदालतें गठित करना राज्यों की जिम्मेदारी बता कर मामले से हाथ झाड़ रहे हैं। ऐसा नहीं हो सकता। पीठ ने सीधा सवाल किया कि केन्द्र सरकार केन्द्रीय योजना के तहत नेताओं के मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन क्यों नहीं करती। जैसे फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित किये गए थे उसी तर्ज पर सिर्फ नेताओं के मुकदमे सुनने के लिए विशेष अदालतें गठित होनी चाहिए। केन्द्र के विशेष अदालतें गठित करने से सारी समस्या हल हो जाएगी। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह विशेष अदालतें गठित करने के बारे में छह सप्ताह में कोर्ट के समक्ष योजना पेश करे। पीठ ने कहा कि योजना पेश होने के बाद विशेष अदालतों के गठन के लिए ढांचागत संसाधन जजों, लोक अभियोजकों व कोर्ट स्टाफ आदि की नियुक्ति जैसे मसलों पर अगर जरूरत पड़ी तो संबंधित राज्यों के प्रतिनिधियों से पूछा जाएगा। इस मामले में 13 दिसंबर को फिर सुनवाई होगी।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

धरातल पर उतरीं केन्द्र की योजनाएं

भारत ने पकड़ी प्रगति की राह, गरीबों तक पहुंची योजनाएं
सुरेश हिन्दुस्थानी
किसी भी देश की प्रगति का पैमाना यह भी माना जाता है कि उस देश के सबसे अंतिम छोर पर निवास करने वाले व्यक्तियों तक सरकार की लाभकारी योजनाओं का कितना प्रभाव पहुंचा है। स्वतंत्रता के 70 साल तक देश की हालत यह थी कि सरकारें केवल योजनाएं बनाकर छोड़ देती थी, योजना केवल कागजों में संचालित होती थी, लेकिन धरातल पर उसका प्रभाव शून्य ही रहता था। योजनाओं के लिए आवंटित राशि भी कहां चली जाती थी, इसका पता भी नहीं चलता था, लेकिन कागज पर लिखे गए शब्द असफल सफलता की कहानी कहते दिखाई देते थे। गरीबों के नाम पर बनाई गई योजनाओं के माध्यम से जितना पैसा व्यय किया गया, वह अगर सही तरीके से व्यय किया जाता तो अब तक देश में किसी भी प्रकार की समस्या ही नहीं रहती।
देश ने पिछले चार वर्षों में बहुत बड़ा राजनीतिक परिवर्तन देखा है। जनहितैषी योजनाएं धरातल पर उतर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने भ्रष्टाचार रहित सरकार देश को दी है। सत्ता प्राप्त करते ही नरेन्द्र मोदी ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि गंभीर समस्याओं के निस्तारण के लिए कड़वी दवाई की आवश्यकता है। जिससे थोड़ी परेशानी सबको हो सकती है, लेकिन देश के लिए समृद्धि के द्वार खुलेंगे। भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि सरकारें तो आती और जाती रहती हैं, राजनीति कोई सत्ता का खेल नहीं, सरकार भले ही चली जाए, लेकिन यह देश रहना चाहिए, देश का लोकतंत्र रहना चाहिए। नरेन्द्र मोदी उसी राह का अनुसरण कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की राजनीति का अध्ययन किया जाए तो यही दिखाई देता है, उन्हें सत्ता का मोह नहीं, वह तो देश को मजबूत बनाने के लिए प्रणा पण से देश सेवा कर रहे हैं। सत्ता केन्द्रित राजनीति ने देश का कबाड़ा किया है। इतना ही नहीं सत्ता केन्द्रित राजनीति कभी देश का भला नहीं कर सकती। मात्र इसी कारण आज देश की जनता के मन में नरेन्द्र मोदी बहुत बड़ी आशा का केन्द्र बनते जा रहे हैं।
केन्द्र सरकार की योजनाओं के बारे में भी आम जनता की धारणा परिवर्तित हुई है। पहले जनता कई चककर लगाने के बाद भी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाती थी, अब अधिकारी और कर्मचारी स्वयं गरीबों के पास जाकर योजनाओं का लाभ देने लगे हैं। मोदी सरकार के कार्यक्रम गरीबों के उत्थान के लिए हैं। अब तो गरीब भी यह समझने लगा है कि यह उनकी अपनी सरकार है। योजनाएं जमीन पर उतर रही हैं। अटलजी के शासनकाल में प्रारंभ हुई सड़क योजना ने देश के सभी गांवों को शहरों से जोड़ने की अद्भुत पहल की थी, जिसके चलते मोदी सरकार ने देश के गांवों से शहरों की दूरी को समाप्त कर दिया है। मोदी सरकार की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इस सरकार ने योजनाओं में लगने वाली देरी को घटाया है यानी योजनाएं अपने तय समय में ही पूरी की जा रही हैं। चाहे वह सड़क का मामला हो या फिर अंधकार युक्त गांवों में प्रकाश फैलाने की ही बात हो। हर योजना तय समय से पहले पूरी हो रही है। इसका आशय यही है कि मोदी सरकार के समय कार्य में गति आई है। अगर यही चलती रही तो स्वाभाविक है कि आगामी कुछ वर्षों में देश ऐतिहासिक प्रगति के नए आयाम स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाएगा।
जहां तक केन्द्र सरकार की योजनाओं की बात है तो मोदी सरकार ने पूरे देश की जनता को सरकार से सीधे जोड़ने का काम किया है। एलपीजी गैस सिलेंडर की बात की जाए तो चार साल पहले तक लम्बी पंक्तियों में लगने के बाद भी आसानी से सिलेंडर प्राप्त नहीं हा पाते थे। इतना ही नहीं कालाबाजारी भी जमकर होती थी, लेकिन अब दृश्य बदल गया है। जनता को अब किसी भी प्रकार की लाइन लगाने की आवश्यकता नहीं है। सिलेंडर सीधे घर तक आ रहा है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसी प्रकार पिछले चार वर्षों में देश के सभी शहर पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा साफ सुथरे दिखाई देने लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हाथ में झाडू क्या ली, पूरा देश सफाई अभियान में जुट गया। आज स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत अभियान में शामिल होने वाले गौरव का अनुभव कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार जैसी बुराई को समाप्त करने के लिए देश को किसी ईमानदार नेता की तलाश थी, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश की वह तलाश भी समाप्त हो गई। नरेन्द्र मोदी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो स्वतंत्र भारत में पैदा हुए हैं। मोदी की ईमानदारी की बात की जाए तो उनकी यह खूबी उन्हें देश के अन्य नेताओं से बहुत अलग करती है कि आज उनका परिवार वैसा ही जीवन व्यतीत कर रहा है, जैसा मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले था। किसी और दल का कोई नेता मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनता तो पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर जाती। जैसा कि देश में पहले से होता आया है। कई राजनेता झोंपड़ी से महलों तक पहुंच गए हैं, भ्रष्टाचार के माध्यम से करोड़ों बटोर लिए हैं।
वास्तव में नरेन्द्र मोदी का चार साल से ज्यादा का कार्यकाल पहले की सरकारों पर भारी पड़ रहा है। बड़ी-बड़ी महाशक्तियां भारत से दोस्ती करने के लिए आतुर हैं। इतना ही नहीं नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में भारत देश विश्व के लिए आशा का केन्द्र बनने की ओर है। प्रधानमंत्री मोदी के कदम अभी से इस बात का संकेत देने लगे हैं कि भारत एक बार फिर से पूरे विश्व का नेतृत्व करते हुए विश्व गुरु के सिंहासन पर आरुढ़ होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)
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नोट : लेख प्रकाशन होने के बाद आपकी ओर से लिंक मिल जाए तो मुझे प्रसन्नता होगी
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सुरेश हिन्दुस्थानी
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Sunday, November 14, 2021

क्या है रानी कमलापति की कहानी

भोपाल में बने भारत के सबसे हाईटेक रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति रेलवे स्टेशन हो गया है, पहले इसका नाम हबीबगंज रेलवे स्टेशन हुआ करता था। आज यह रेलवे स्टेशन किसी इंटरनेशनल एयरपोर्ट को भी मात देता है। लेकिन हम स्टेशन की भव्यता की नहीं बल्कि उसकी दिव्यता की बात करेंगे, और दिव्यता इस रेल्वे स्टेशन के नाम में है। 
  *जब भोपाल के इस स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम पर रखे जाने का समाचार लोगों ने सुना तो शेष भारत तो छोड़िये, मध्यप्रदेश भी जाने दीजिये, भोपाल के नागरिकों तक को भी आश्चर्य हुआ कि ये रानी कमलापति कौन थी? भोपाल को तो नवाबों ने बसाया है, भोपाल में किसी हिन्दू राजा का नाम अगर सुना वो राजा भोज का सुना*, *तो फिर ये रानी कमलापति कहां से आ गई ?*
  और रानी कमलापति कौन है, यदि स्टेशन के नामान्तरण के बाद यह प्रश्न आपके भी मन में उठा हो, तो समझिये पिछले एक शतक के षड्यंत्र के परिणाम आंशिकरूप से आपके मस्तिष्क पर भी हुए हैं। वे हमें हमारी जड़ों से काटना चाहते थे और कुछ भी कहो वे कुछ हद तक सफल तो हुए हैं। 
  खैर, रानी कमलापति को मध्यप्रदेश की पद्मावती  भी कह  सकते हैं। जैसे पद्मावती ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर किया था, ठीक वैसे ही रानी कमलापति ने भी जलसमाधि ली थी। 
  सोलहवीं सदी में समूचे भोपाल क्षेत्र पर हिन्दू  गोंड राजाओं का ही शासन था। कमलापति गोंड राजा निजामशाह की पत्नी थीं। भोपाल के पास गिन्नौरगढ़ से राज्य का संचालन होता था। फिर गद्दी का मोह कुटुंबियों में आया ।राजा निजामशाह के भतीजे आलमशाह, जिसका बाड़ी पर शासन था, के मन में गिन्नौरगढ़ को हड़पने का विचार आया। लड़ तो सकता नहीं था, तो घटिया हरकत की, निजामशाह को खाने पर बुलाया ,खाने में जहर मिलाया और राजा को परलोक पहुंचाया। 
  रानी अपने बेटे नवलशाह की रक्षा के लिए बेटे को लेकर गिन्नौरगढ़ से भोपाल आ गई। भोपाल के छोटे तालाब के पास रानी का महल था। रानी ने अफगानिस्तान से आये हुए मोहम्मद खान से अपने पति के हत्यारे आलमशाह को सबक सिखाने की बात की, मोहम्मद खान एक लाख रुपये के बदले काम करने को तैयार हुआ और उसने आलमशाह को मौत के घाट उतार दिया। पर रानी के पास उस समय धन की पूरी व्यवस्था न हो पाने के कारण रानी ने भोपाल का एक हिस्सा मोहम्मद खान को दे दिया। 
  किन्तु कुछ समय बाद मोहम्मद खान की भी स्वार्थी और विश्वासघाती वृत्ति बड़ी होकर सामने आ गई। उसकी नीयत पूरे भोपाल पर कब्जा करने की थी और इससे भी बुरी बात यह थी कि रानी पर भी उसकी कुदृष्टि थी ।आखिरकार रानी के चिरंजीव नवलशाह और मोहम्मद खान के बीच युद्ध हुआ ,युद्ध अत्यंत भयानक था। इतना कि जिस घाटी पर युद्ध हुआ वो खून से लाल हो गई, भोपाल में आज भी उसे लालघाटी कहते हैं। रानी माता की मानरक्षा के लिए अन्य सैनिकों के साथ नवलशाह का भी बलिदान हो गया। अंत में केवल दो लोग बचे, उन्होंने लालघाटी से धुँआ छोड़ा ,,महल में बैठी रानी इसका अर्थ समझ गईं। उन्होंने अपने निजी सेवकों को तालाब की नहर का रास्ता अपने महल की ओर मोड़ने के आदेश दिए। रानी अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ महल के सबसे नीचे वाले तल में जाकर बैठ गईं और अपने शील की रक्षा के लिए जल-समाधि ले ली। 
  *इसे जल-समाधि की जगह जल-जौहर भी कह सकते हैं। जैसे रानी पद्मिनी के साथ अगणित महिलाओं ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया था,  वैसा ही रानी कमलापति ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए किया।* 
  आज भी रानी के महल की पांच मंजिलें पानी में डूबी हुई हैं, केवल दो मंजिलें ही पानी से बाहर हैं ,
पर हाय रे दुर्भाग्य! कौन बताए बच्चों को रानी का सतीत्व और साहस ,हम तो तालाब घूमने आये और फोटो खिंचाकर चल दिए। क्यों, कैसे, कब, किसने यह महल बनवाया था, कभी जानना ही नहीं चाहा । लडकियां तालाब के साथ ,महल के साथ सेल्फी लेती हैं, हैशटेग नेचरलवर के साथ स्टोरी डालती हैं, किन्तु उस भारत माँ की सपूत रानी का इतिहास नहीं जानना चाहतीं। 
  ऐसी न जाने कितनी कमलापतियों का इतिहास उस महल की तरह ही अँधेरे में डूबा हुआ है। उन पर अब प्रकाश जाने लगा है और दुनिया उससे आलोकित होने लगी है। वरना देश में छः से ज्यादा महापुरुष ही नहीं हुए, ऐसा लगने लगा था, हर नगर में, हर गांव में उनके ही नाम के संस्थान, चौराहे सब हुआ करते थे। किन्तु अब हमारे स्थानीय महापुरुषों के नाम पर विश्वस्तरीय रेलवे स्टेशन का नाम रखा जाने लगा है यह सच में सत्य के उद्घाटन का समय हैं . 
किन्तु हम सबको अपने व्यवहार में इन नामो को लाना पड़ेगा ,अन्यथा आज भी कई लोग प्रयागराज को इलाहाबाद ही कहते हैं ,नर्मदापुरम को होशंगाबाद और दीनदयाल रेलवे स्टेशन को मुगलसराय स्टेशन 
अब सरकारे तो अपने हिस्से का कार्य  कर रहीं हैं ,लेकिन हम सबको भी अपने नित्य व्यवहार में  इन शब्दों को लाकर अपने हिस्से का कार्य करना पड़ेगा ,तभी आक्रान्ताओं के कलंक पूरी तरह मिटेंगे 
और  सत्य ,सूर्य के समान उद्घाटित होकर विश्व को आलोकित करेगा ।।

Thursday, December 10, 2020

राजनीतिक आंदोलन बना किसान आंदोलन

सुरेश हिन्दुस्थानी
वर्तमान में कृषि प्रधान देश का किसान आंदोलित है, उद्वेलित भी है। इसके पीछे का कारण यदि हम सत्ताधारी दलों को मानें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करते ही शासकों की भूमिका में आते चले गए, और देश की मूलभूत आवश्यकताओं को किनारे पर रख दिया। वास्तव में जब हम उच्चारित करते हैं कि भारत कृषि की प्रधानता के चलते ही आगे बढ़ सकता है, तब उतनी ही गति से यदि शासन स्तर पर विचार किया जाता तो किसान के समक्ष आज के जितनी कठिन स्थिति निर्मित नहीं होती। किसान को अन्नदाता और भूमिपुत्र कहकर बड़े बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन देश के राजनेता किसानों की दशा के बारे प्रारंभिक जानकारी भी नहीं रखते। इसका प्रमाण इससे भी मिल जाता है कि हमारे राजनेता कभी आलू से सोना बनाने की मशीन लगाने की बात करते हैं तो कोई नेता गमलों में गोभी उगाकर करोड़पति बन जाता है।
हमारे देश का किसान आज भी बहुत भोला है, उसे राजनीति नहीं आती। उसे जैसा बोल दिया जाता है वह वैसा ही मान लेता है। अब किसान आंदोलन को ही ले लीजिए, इसमें केवल आशंकाएं ही निर्मित की जा रही हैं। मात्र संदेह के आधार पर राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसानों को भ्रमित किया जाना किसानों के साथ तो अन्याय है ही, साथ ही देश के साथ भी बड़ा धोखा है। यह बात सही है कि आज किसान दुखी है, लेकिन इस दुख के लिए हमारी 70 वर्ष की शासन व्यवस्था ही जिम्मेदार है। हमारे देश के किसानों ने भी नए नए प्रयोग करने अपनी उपज तो बढ़ा ली, लेकिन भूमि पर इसके जो दुष्परिणाम हुए हैं, उसके कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है। देश में कहीं कम तो कहीं ज्यादा फसल उत्पादन भी असमानता पैदा करता है। अभी जो कानून केंद्र सरकार द्वारा लाया गया है, उसकी पूरी जानकारी भी किसानों को नहीं है। वास्तविकता यह है कि इन कानूनों से वे लोग प्रभावित हो रहे हैं, जो बिचौलिए यानी दलाली का काम करते हैं। यही दलाल लोग किसानों को भड़का रहे हैं। जबकि छोटा किसान इन कानूनों के माध्यम से सुरक्षित हो रहा है, उसे जहां उचित कीमत मिलेगी वहां अपनी फसल बेचने का अधिकार होगा। सरकार द्वारा निर्धारित कीमत से कम में खरीदने वाले व्यापारियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही का भी प्रावधान इन कानूनों में किया गया है।
कांग्रेस शासित राज्य पंजाब से प्रारंभ हुआ किसान आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने के लिए किसान संगठनों ने राजनीतिक दलों से समर्थन लेकर भारत बंद का नारा दिया था, लेकिन भारत बंद किसानों का न होकर राजनीतिक दलों का हो गया। इस भारत बंद को वे ही राजनीतिक दल समर्थन कर रहे थे, जो या तो नेपथ्य में जा चुके हैं या फिर जिनकी राजनीति केवल भाजपा विरोध पर ही आधारित है। इसमें जो किसान आंदोलन कर रहे हैं, उनकी मांगों पर मंथन किया जाना आवश्यक है, लेकिन किसान जिस प्रकार से अड़ियल रवैया अपनाए हैं, वह मंथन पर पूरी तरह से विराम स्थापित कर रहे हैं। कहा जाता है कि जब किसी आंदोलन में राजनीतिक स्वार्थ का विचार हावी हो जाता है तब उसकी दिशा बदल जाती है और परिणाम भी सार्थक दिखाई नहीं देता।
देश में किसान कानून के विरोध के नाम पर चल रहे राजनीतिक खेल पर उस समय प्रमाणित मुहर लगती दिखाई दी, जब 20 छोटे बड़े राजनीतिक दलों ने भारत बंद का समर्थन कर दिया। मात्र आशंकाओं के आधार पर किए जा रहे इस किसान आंदोलन को लेकर सवाल तो उस समय ही खड़े हो गए थे, जब खालिस्तान समर्थक विदेशी ताकतों ने इसका समर्थन कर दिया। स्वाभाविक ही है कि आज विश्व के कई देश भारत की बढ़ती ताकत से परेशान हैं। इसलिए किसी न किसी कारण भारत में ऐसी स्थितियां पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सके। इसके लिए वो ताकतें भी जिम्मेदार मानी जा रही हैं, जो अपनी गलत नीतियों के कारण राजनीतिक पराभव के दौर से गुजर रहीं हैं। इसलिए इस आंदोलन को किसान आंदोलन कम, राजनीतिक आंदोलन ज्यादा माना जा रहा है।
देश के किसानों को चाहिए कि वह किसी की बातों में न आकर पहले इन कानूनों का अध्ययन करे, और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे। अभी जो आंदोलन किया जा रहा है, उसके चलते अगर किसान कानून वापस भी हो जाए तो इससे छोटे किसानों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन किसानों के नेता बने बड़े व्यापारी जरूर फायदे में रहेंगे। जैसी आशंका प्रचारित की जा रही है कि सरकार खेती को देश के बड़े उद्योगपतियों को देने जा रही है, यह आशंका ही निर्मूल है। क्योंकि इस कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है। इस कानून को लेकर देश में वैसा ही भ्रम फैलाने का प्रयास किया जा रहा है, जैसा नागरिकता कानून के बारे में फैलाया गया था। उस कानून में केवल विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने की ही बात थी, लेकिन राजनीतिक दलों ने देश के नागरिकों के समक्ष ऐसा भ्रम उपस्थित किया कि यह मुसलमानों को बाहर निकालने का कानून है। ऐसा ही खेल कृषि कानूनों को लेकर खेला जा रहा है। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि इस किसान आंदोलन में पर्दे की पीछे शाहीन बाग के षड्यंत्रकारी भी भूमिका निभा रहे हैं।
देश के किसानों को चाहिए कि वह सही और गलत की पहचान करे। क्योंकि हमने देखा है कि जबसे कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई है तब से कांग्रेस और वामपंथी दल ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जो देश को अस्थिर कर सकते हैं। चाहे वह पुरस्कार वापसी का मामला हो या फिर जेएनयू का देश विरोधी छात्र आंदोलन। सवाल यह भी उठ रहा है कि वामपंथी राजनीति देश को भ्रमित क्यों कर रही है और कांग्रेस इसका आंख बंद करके समर्थन क्यों कर रही है? आज देश के लिए एक अच्छी बात यह है कि देश में केंद्र सरकार ने शासन स्तर पर कोई भ्रष्टाचार नहीं किया। केंद्र सरकार आज एक बड़ी आशा का केंद्र बनती जा रही है। विपक्षी दलों को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है। इसलिए वह जबरदस्ती मुद्दे बनाने का प्रयास कर रहे हैं। किसान आंदोलन भी उसी रणनीति का हिस्सा है।
(लेखक राजनीतिक चिंतक एवं विचारक हैं)
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सुरेश हिन्दुस्थानी
व्हाट्सएप : 9770015780
मेल भी कर दिया है।

Thursday, August 9, 2018

यह पाकिस्तान प्रेम है या...?

यह पाकिस्तान प्रेम है या...?
पाकिस्तान में नई सरकार बनने की कवायद होने लगी है। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रुप में पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान शपथ लेने जा रहे हैं। पाकिस्तान की ओर से शपथ ग्रहण समारोह में बुलाये जाने वाले अतिथियों के बारे में स्पष्ट तौर पर मना किया जा चुका है। ऐसी बातें भी समाचारों में सामने आर्इं थी कि इमरान के शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हो सकते हैं, लेकिन बाद में यह भी सामने आ चुका है कि पाकिस्तान की ओर से इस समारोह में किसी को भी नहीं बुलाया जा रहा है। पाकिस्तान की ओर से की गई इस मनाही के बाद भी भारत के कुछ व्यक्तित्व कहते हुए दिखाई देते हैं कि अगर आमंत्रण मिलता है तो वह जरुर जाएंगे। यह बात यच है कि पाकिस्तान हमारे देश का दुश्मन है, सीमा पार से प्रतिदिन आतंकी कार्यवाहियां भी होती रहती हैं। इतना ही नहीं पाकिस्तान की ओर से वहां के जिम्मेदार नेताओं की ओर से भारत के विरोध में बयान भी आते रहते हैं, ऐसी स्थिति में किसी भी हालत में पाकिस्तान में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने की सोचना पूरी तरह से गलह ही माना जाएगा। भाजपा नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने इससे दो कदम बढ़कर बयान दिया है। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने की मानसिकता रखने वालों को गद्दार तक कह दिया है। उनके इस बयान को अतिरेक माना जा रहा है, लेकिन गद्दार शब्द गलत हो सकता है, भावना ठीक ही है। दुश्मन देश के किसी समारोह का हिस्सा बनना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। पाकिस्तान में अभी इमरान खान प्रधानमंत्री बने भी नहीं हैं, लेकिन भारत के अभिन्न हिस्सा माने जाने वाले कश्मीर के बारे में इमरान का बयान उनकी मंशा को स्पष्ट करता है। इमरान खान की पार्टी की इतनी बड़ी सफलता का राज यही माना जा रहा है कि उनको वहां की सेना और आतंकवादियों का पूरा समर्थन मिला है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान की नई सरकार भी आतंकियों व सेना के इशारे पर ही काम करेगी। इन हालातों में पाकिस्तान के किसी समारोह में भारतीय व्यक्तित्वों का जाना उचित नहीं है। जहां तक इमरान खान के पाकिस्तान का नया प्रधानमंत्री बनने की बात है तो भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से उन्हें प्रधानमंत्री बनने की बधाई देना सकारात्मकता का हिस्सा है, और केवल इतना ही किया जाना पर्याप्त है। हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच में रातनीतिक संबंध समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन पाकिस्तान की गतिविधियों को देखकर ऐसा ही लगता है कि वह भारत से किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रखना चाहता। इस प्रकार का वातावरण निर्मित करने में कट्टरपंथी मुसलमान पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। हमें पाकिस्तान के बारे में सोचने से पहले कई बातों पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए।

दांपत्य जीवन : जब हम की जगह ले ले मैं

दाम्पत्य जीवन में "हम" की जगह "मैं" ले लेता है तो रिश्ते की नैया डगमगाने लगती है और क्लेश होना रोज की बात हो जाती है। ...