पश्चिम बंगाल में भारी मतदान से यह तो तय हो चुका है कि मतदाता चुनाव का महत्व समझ चुका है। लेकिन इससे राजनीतिक दलों को हिसाब लगाने में पसीना बहाना पड़ रहा है। सबके गणित उलझ गए हैं। पहले चरण में 92 प्रतिशत मतदान जहाँ एक ओर राजनीतिक दलों के लिए चिंता की लकीर खींच रहा है, वहीं एक राजनीतिक लाभ देने का भी संकेत करने वाला भी कहा जा रहा है। इस बार के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। भाजपा बहुत पहले से पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए कदम उठा रही थी। पिछले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव में जिस प्रकार से भाजपा ने अपना राजनीतिक प्रभाव जमाया है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा सकता। यही आंकड़े तृणमूल कांग्रेस की सरकार के लिए खतरे की घंटी बजाते हुए दिखाई देने लगे हैं। ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि उनके सामने अपनी राजनीतिक साख बचाने की मज़बूरी है। राजनीतिक आकलन किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि ममता केवल और केवल पश्चिम बंगाल तक ही अपना राजनीतिक प्रभाव रखती हैं, अगर किसी कारण से पश्चिम बंगाल भी उनके हाथ से निकल जाता है, तो तृणमूल कांग्रेस को अपना जनाधार स्थापित करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ेगा। हालांकि ममता बनर्जी की कार्यशैली को देखकर यह कोई नहीं कह सकता कि वह आसानी से पराजय स्वीकार कर लेंगी। सभी जानते हैं कि वह स्वयं मोर्चा संभाल लेती हैं। एसआईआर के मुद्दे पर हम सभी ने देखा ही है कि वे सर्वोच्च न्यायालय में भी खड़ी हो गई। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का इस तरह मजबूती के साथ खड़ा होने का यह पहला मामला है।
जहाँ तक पश्चिम बंगाल में भविष्य की सरकार बनाने की बात है तो भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के अपने अपने दावे हैं। यह बात भी सही है कि यह दोनों ही राजनीतिक दल मुख्य मुकाबले में हैं। भाजपा के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि उसके राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने प्रभावी रूप से जनता के बीच उपस्थिति दर्ज करवाकर माहौल को अपने पक्ष में करने का भरपूर प्रयास किया, वहीं भाजपा के प्रादेशिक नेताओं ने भी जी तोड़ प्रयास किया। तृणमूल कांग्रेस की ओर से हर जगह ममता बनर्जी की जनसभाओं की ही मांग हो रही थी, जिसे ममता ने पूरा करने का भी प्रयास किया। मतदान प्रतिशत बढ़ने से भाजपा आशान्वित है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के चेहरे से मुस्कान गायब दिखाई दे रही है।
अभी पश्चिम बंगाल में प्रथम चरण का मतदान ही संपन्न हुआ है। बम्पर मतदान के बाद आम जनता में उत्साह की एक नई लहर का प्रादुर्भाव भी हुआ है। जिसके बाद यह भी संभव है कि दूसरे चरण में भी इसकी पुनरावृति होगी। अगर ऐसा होता है तो यह कहना भी तर्कसंगत ही होगा कि इस बार का मतदान बिना भय के संपन्न हो रहा है। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव का इतिहास रक्तरंजित है। वामपंथी दलों के शासन से लेकर तृणमूल कांग्रेस की सरकार के समय हुए सभी चुनावों में हिंसा होती आई है, लेकिन इस बार के चुनावों में इस प्रकार दृश्य का दिखाई नहीं देना, चुनाव प्रबंधन की कुशलता ही मानी जाएगी। पश्चिम बंगाल में यह साफ दिखाई देने लगा है कि इस बार आम जनता भय मुक्त होकर मतदान करने निकल रही है। मतदान प्रतिशत का बढ़ना भी इसी भयमुक्त वातावरण का ही परिचायक है।
प्रायः माना जाता है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी एक सशक्त महिला नेता हैं। आज वे निश्चित रूप से भारतीय राजनीति का एक स्थापित चेहरा हैं। महिला होने के नाते उन्हें महिलाओं की सहानुभूति भी मिलती रही है। लेकिन इस चुनाव में केंद्र भी भाजपा सरकार ने नारी शक्ति को केंद्र मानकर जो वंदन अभियान चलाया, वह भाजपा के लिए एक संजीवनी बनती दिखाई दे रही है। दूसरी प्रमुख बात यह भी है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता बांग्लादेशी घुसपैठियों का खुलेआम समर्थन भी करते रहते हैं। कई राजनीतिक विश्लेषक तो यही मानते हैं कि ये बांग्लादेशी घुसपैठिए ममता की सरकार बनाने में मदद करते रहे हैं। यह सच है या झूठ… इसकी विस्तृत जानकारी जांच के बाद ही सामने आएगी। खास बात यह भी है कि इस चुनाव में ऐसे मतदाता मतदान करने से वंचित रहे, जो अपने भारतीय नागरिक होने का प्रमाण नहीं दे सके। कहा जाता है कि इनमें से अधिकतर वोट तृणमूल कांग्रेस के ही थे। स्वाभाविक ही है कि इसका असर भी ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन पर ही होगा। मुसलमान वर्ग का हितैषी होने का दावा करने वाली तृणमूल कांग्रेस के सामने इस चुनाव में मुसलमान नेताओं अससुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर ने एक चुनौती पेश की। इस चुनौती का असर कितना होगा, इसका पता चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अगर इनका जादू चल गया तो ममता के साथ खेला भी हो सकता है। ममता के सामने इस चुनाव में अपने खुद के वोटरों को साधने की बड़ी चुनौती थी। अब दूसरे चरण का मतदान होना है। चार मई को बम्पर मतदान का क्या परिणाम आएगा। पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी, यह तय हो जाएगा। हालांकि इसके मायने निकाले जा रहे हैं। इस मायनों में मतदान प्रतिशत बढ़ने का आशय भाजपा की लोकप्रियता को बताया जा रहा है, वहीं कुछ विश्लेषक ममता के पक्ष में भी बात करते दिखते हैं।
(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और स्वतंत्र पत्रकार हैं)