दिल्ली में संत्राश की छाया
सुरेश हिन्दुस्थानी
जहरीली हवाओं के संत्रास को यूं तो पूरा देश ही झेल रहा है, लेकिन इस बार सर्दियों से ठीक पहले दिल्ली का वतावरण ऐसा हो गया है कि सांस लेने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा-उत्तर प्रदेश के निकटवर्ती जिलों में हवा का प्रदूषण फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि ऐसा कोई पहली बार नहीं बल्कि पिछले कुछ सालों से लगातार यह प्रदूषण जानलेवा स्तर तक पहुंचता नजर आ रहा है। आखिर ऐसा क्यों है कि सर्दियों के ठीक पहले ही दिल्ली की हवा अचानक जहरीली बन जाती है? वातावरण खराब करने के लिए पटाखों को जिम्मेदार मानकर उन पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन प्रतिबंध से कोई भी हल नहीं निकल सका। इसका मतलब भी साफ है कि दिल्ली के वातावरण को प्रदूषित करने के लिए केवल पटाखे ही जिम्मेदार नहीं थे, अगर पटाखे जिम्मेदार होते तो शायद अबकी बार इसमें कमी आई होती। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार प्रदूषण खतनाक स्थिति में पहुंच चुका है। दिवाली के बाद फसल कटने और पराली जलने का भी मौसम कब का बीत चुका है, पराली जलाने के समय भी इतना प्रदूषण नहीं फैला जितना अब फैल रहा है। हवा प्रदूषित कैसे हुई? इसकी जानकारी होनी चाहिए थी, लेकिन सरकार और प्रशासन को संकट गहराने पर हाथ-पैर हिलाने की आदत सी पड़ी हुई है। दिल्ली वैसे भी सालों से दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी के तौर पर पहले से ही बदनाम है, लेकिन इसका चिंता न तो केन्द्र और राज्य की सरकार को रहती है। कई सालों से दिल्ली प्रदूषण की त्रासदी भोग रही है, लेकिन इससे कोई निजात पाने का स्थाई हल कभी खोजा नहीं जाता। आज भी जब हवा में जहर घुला नजर आ रहा है तब सरकार कुछ राहत वाले कदम उठा रही है। सवाल है कि जब हमें वायु प्रदूषण के मामले में विभिन्न तरह की रिपोर्टों से यह चेतावनियां मिलती रहती हैं कि वायु प्रदूषण के मामले में भारत में हवा में घुली गंदगी से होने वाली मौतों के मामले में भारत पिछड़ रहा है। इस मामले में हमारी सरकारों को यह भी देखना चाहिए कि सरकारी स्तर पर जो प्रयास किए जा रहे हैं, वह धरातल पर उतने ही तरीके से क्रियान्वित हो पा रहे हैं या नहीं। प्राय: यह सुना जाता है कि शासन की कई योजनाएं वास्तविकता से बहुत दूर होती हैं। इसमें दोष सरकार का नहीं, बल्कि क्रिशन्वित करने वाले उन अधिकारियों का है, जो केवल कागजी खानापूर्ति करके कार्य की इतिश्री कर देते हैं। वर्तमान में कई सरकारी योजनाएं सरकारी कागजों में बहुत बड़ी सफलता की कहानी कह रही हैं, लेकिन धरातल पर उनका इंच मात्र भी अस्तित्व नजर नहीं आता। पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए शासन स्तर पर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं को संचालित करने के लिए गैर सरकारी संस्थाएं सरकारी अनुदान प्राप्त करके दिखावे की सफलता का बखान भी करते हैं, उसके बाद क्या कारण है कि प्रदूषण कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। वास्तव में गैर सरकारी संस्थाएं केवल सरकारी पैसों का पूरी तरह से दुरुपयोग ही कर रही हैं। वर्तमान में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए जो संस्थाएं काम कर रही हैं, उनके कार्यों की जांच होना चाहिए और जो काम उन संस्थाओं ने अपने कागजों में दर्शाया है, वह सत्य नहीं होने पर उनको अनुदान देना बंद कर देना चाहिए। संयोग की ही बात है कि भारत वायु प्रदूषण के मामले में लगातार जिस चीन से होड़ ले रहा है, उसकी राजधानी बीजिंग में भी मंगलवार को दिल्ली जैसा ही माहौल बना, लेकिन उसने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा से एक दिन पहले ही जहरीली धुंध से निजात पा लिया। यदि प्रदूषण रोकने के मामले में दिल्ली जैसी हीलाहवाली की जाती रही तो दिल्ली जैसा बुरा हाल देश के अन्य हिस्सों खासकर उत्तर भारत में भी देखने को मिलेगा। प्रदूषण के मामले में दिल्ली का बुरा हाल तब है जब सर्दियां शुरू ही हुई है। आने वाले समय में जब सर्दी बढ़ने के कारण हवा में नमी बढ़ेगी तो देश के अन्य शहरों में भी प्रदूषण घातक स्थिति में पहुंच सकता है। होना तो यह चाहिए कि सभी राज्य अपने-अपने स्तर पर प्रदूषण की रोकथाम के लिए कमर कसें, लेकिन इससे आसार कम ही हैं। इस मामले में पंजाब व हरियाणा की सरकारों को कहीं अधिक सक्रियता दिखाने की आवश्यकता थी, लेकिन दोनों ही राज्य अपने आश्वासन को पूरा करने में नकार रहे। नि:संदेह केवल हरियाणा और पंजाब को दोष देकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं की जा सकती क्योंकि प्रदूषण का एक मात्र कारण पराली जलाया जाना नहीं है। पराली पिछले माह से नहीं जलाई जा रही है। सच तो यह है कि वायु प्रदूषण गंभीर रूप तब लेता है जब वायु मण्डल में वाहनों के उत्सर्जन, कलकारखानों के धुएं और सड़कों एवं निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल की मात्रा बढ़ जाती है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी कई बार सरकारों को चेता चुका है, लेकिन उस ओर गंभीरता नहीं बरती गई। अगर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को घातक प्रदूषण से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता तो फिर यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि दूसरे राज्यों में कोई सतर्कता बरती जाएगी? दिल्ली का वायु प्रदूषण स्थाई समस्या है और इसका समाधान की स्थाई हल निकालना होगा।
सुरेश हिन्दुस्थानी
जहरीली हवाओं के संत्रास को यूं तो पूरा देश ही झेल रहा है, लेकिन इस बार सर्दियों से ठीक पहले दिल्ली का वतावरण ऐसा हो गया है कि सांस लेने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा-उत्तर प्रदेश के निकटवर्ती जिलों में हवा का प्रदूषण फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि ऐसा कोई पहली बार नहीं बल्कि पिछले कुछ सालों से लगातार यह प्रदूषण जानलेवा स्तर तक पहुंचता नजर आ रहा है। आखिर ऐसा क्यों है कि सर्दियों के ठीक पहले ही दिल्ली की हवा अचानक जहरीली बन जाती है? वातावरण खराब करने के लिए पटाखों को जिम्मेदार मानकर उन पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन प्रतिबंध से कोई भी हल नहीं निकल सका। इसका मतलब भी साफ है कि दिल्ली के वातावरण को प्रदूषित करने के लिए केवल पटाखे ही जिम्मेदार नहीं थे, अगर पटाखे जिम्मेदार होते तो शायद अबकी बार इसमें कमी आई होती। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार प्रदूषण खतनाक स्थिति में पहुंच चुका है। दिवाली के बाद फसल कटने और पराली जलने का भी मौसम कब का बीत चुका है, पराली जलाने के समय भी इतना प्रदूषण नहीं फैला जितना अब फैल रहा है। हवा प्रदूषित कैसे हुई? इसकी जानकारी होनी चाहिए थी, लेकिन सरकार और प्रशासन को संकट गहराने पर हाथ-पैर हिलाने की आदत सी पड़ी हुई है। दिल्ली वैसे भी सालों से दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी के तौर पर पहले से ही बदनाम है, लेकिन इसका चिंता न तो केन्द्र और राज्य की सरकार को रहती है। कई सालों से दिल्ली प्रदूषण की त्रासदी भोग रही है, लेकिन इससे कोई निजात पाने का स्थाई हल कभी खोजा नहीं जाता। आज भी जब हवा में जहर घुला नजर आ रहा है तब सरकार कुछ राहत वाले कदम उठा रही है। सवाल है कि जब हमें वायु प्रदूषण के मामले में विभिन्न तरह की रिपोर्टों से यह चेतावनियां मिलती रहती हैं कि वायु प्रदूषण के मामले में भारत में हवा में घुली गंदगी से होने वाली मौतों के मामले में भारत पिछड़ रहा है। इस मामले में हमारी सरकारों को यह भी देखना चाहिए कि सरकारी स्तर पर जो प्रयास किए जा रहे हैं, वह धरातल पर उतने ही तरीके से क्रियान्वित हो पा रहे हैं या नहीं। प्राय: यह सुना जाता है कि शासन की कई योजनाएं वास्तविकता से बहुत दूर होती हैं। इसमें दोष सरकार का नहीं, बल्कि क्रिशन्वित करने वाले उन अधिकारियों का है, जो केवल कागजी खानापूर्ति करके कार्य की इतिश्री कर देते हैं। वर्तमान में कई सरकारी योजनाएं सरकारी कागजों में बहुत बड़ी सफलता की कहानी कह रही हैं, लेकिन धरातल पर उनका इंच मात्र भी अस्तित्व नजर नहीं आता। पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए शासन स्तर पर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं को संचालित करने के लिए गैर सरकारी संस्थाएं सरकारी अनुदान प्राप्त करके दिखावे की सफलता का बखान भी करते हैं, उसके बाद क्या कारण है कि प्रदूषण कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। वास्तव में गैर सरकारी संस्थाएं केवल सरकारी पैसों का पूरी तरह से दुरुपयोग ही कर रही हैं। वर्तमान में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए जो संस्थाएं काम कर रही हैं, उनके कार्यों की जांच होना चाहिए और जो काम उन संस्थाओं ने अपने कागजों में दर्शाया है, वह सत्य नहीं होने पर उनको अनुदान देना बंद कर देना चाहिए। संयोग की ही बात है कि भारत वायु प्रदूषण के मामले में लगातार जिस चीन से होड़ ले रहा है, उसकी राजधानी बीजिंग में भी मंगलवार को दिल्ली जैसा ही माहौल बना, लेकिन उसने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा से एक दिन पहले ही जहरीली धुंध से निजात पा लिया। यदि प्रदूषण रोकने के मामले में दिल्ली जैसी हीलाहवाली की जाती रही तो दिल्ली जैसा बुरा हाल देश के अन्य हिस्सों खासकर उत्तर भारत में भी देखने को मिलेगा। प्रदूषण के मामले में दिल्ली का बुरा हाल तब है जब सर्दियां शुरू ही हुई है। आने वाले समय में जब सर्दी बढ़ने के कारण हवा में नमी बढ़ेगी तो देश के अन्य शहरों में भी प्रदूषण घातक स्थिति में पहुंच सकता है। होना तो यह चाहिए कि सभी राज्य अपने-अपने स्तर पर प्रदूषण की रोकथाम के लिए कमर कसें, लेकिन इससे आसार कम ही हैं। इस मामले में पंजाब व हरियाणा की सरकारों को कहीं अधिक सक्रियता दिखाने की आवश्यकता थी, लेकिन दोनों ही राज्य अपने आश्वासन को पूरा करने में नकार रहे। नि:संदेह केवल हरियाणा और पंजाब को दोष देकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं की जा सकती क्योंकि प्रदूषण का एक मात्र कारण पराली जलाया जाना नहीं है। पराली पिछले माह से नहीं जलाई जा रही है। सच तो यह है कि वायु प्रदूषण गंभीर रूप तब लेता है जब वायु मण्डल में वाहनों के उत्सर्जन, कलकारखानों के धुएं और सड़कों एवं निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल की मात्रा बढ़ जाती है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी कई बार सरकारों को चेता चुका है, लेकिन उस ओर गंभीरता नहीं बरती गई। अगर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को घातक प्रदूषण से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता तो फिर यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि दूसरे राज्यों में कोई सतर्कता बरती जाएगी? दिल्ली का वायु प्रदूषण स्थाई समस्या है और इसका समाधान की स्थाई हल निकालना होगा।